
आचार्य प्रशांत: ज्ञान बिना भक्ति असंभव है। जो ये सोचे कि ज्ञान नहीं होगा, समझेंगे नहीं, बोध नहीं होगा पर भक्त बन जाएँगे, वो आत्मप्रवंचना में है, *सेल्फ-डिसेप्शन*। उसकी भक्ति फिर ऐसी ही होगी, कैसी वाली? (आँखें बंद करके भजन करने का अभिनय करते हुए) ये वाली भक्ति होगी।
असली…

प्रश्नकर्ता (प्र): इस घाट पर, आचार्य जी, ये तीन मूर्तियाँ हैं और इनको देखकर एक जिज्ञासा उठ रही है: जो देवी की मूर्ति है यह इतनी बड़ी है और जब हम ऋषि की मूर्ति देखते हैं तो वह उनके सामने बड़ी छोटी मालूम होती है। देवी, ऋषि से बड़ी हैं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ओशो कहते हैं, "धर्म का सार है- राम खुमारी।" 'राम खुमारी' क्या है? कृपया प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: तुम जिसे आमतौर पर होश कहते हो, जब समझ उठती है तो ये होश डगमगाने लगता है। ये झूठा होश है। कुछ वैसा-सा ही मज़ा आने…

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।
~ संत तुलसीदास
आचार्य प्रशांत: भक्तों के हित की ख़ातिर ही, राम-ब्रह्म (ब्रह्म-राम) ने मनुष्य राम का शरीर-रूप धारण किया, और धरती पर मनुष्य-संबंधी, मनुष्य के तल पर बहुत सारी लीलाएँ करीं।

क्यों देश-विदेश फिरे मारा क्यों हाल-बेहाल थका हारा क्यों देश-विदेश फिर मारा तू रात-बीरात का बंजारा ओ नादान परिंदे घर आजा घर आजा… घर आजा… घर आजा आ आ… नादान परिंदे घर आजा…
~ फ़िल्म (रॉकस्टार)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल से जो हिन्दुओं की परंपरा का एक प्रमुख उत्सव माना जाता है, नवरात्रि, वो शुरू हो रहा है। शक्ति के नौ रूपों की आध्यात्मिक उपयोगिता क्या है? शिव-शक्ति को माना जाता है कि एक ही उनका स्वरूप है, फिर ये नौ अलग-अलग स्वरूप क्या दर्शाते हैं?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आपकी सभी बातें पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता। मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम फँस इसीलिए जाते हो क्योंकि तुम्हें तकलीफ़ सिर्फ़ तब होती है जब ऊँचे काम ख़राब होते हैं, कि, "ऊँचा काम हो रहा था और मैं किसी निचले केंद्र में ही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी-कभी घबराहट-सी होती है, और अचानक गुस्सा आ जाता है। समझ नहीं आता क्या करूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं।
गुस्सा आना कोई बुरी बात नहीं है, गुस्से के पीछे कारण सही रखो। जब लगता है कि कुछ मिल नहीं रहा है, जब लगता

प्रश्नकर्ता: ये युद्ध क्या होता है? मतलब युद्ध क्यों होता है? इसमें सही कौन होता है? क्या जैसे पुराने योद्धा होते थे, तो इनको कहा जा सकता था कि इनके अंदर अहंकार होता था? ये किसलिए लड़ते थे?
आचार्य प्रशांत: ‘लड़ाई’ की परिभाषा समझो। तुम उधर को जा रहे हो…

नानक निर्गुणी गुण करे गुणवतीय: गुण देह
~ गुरु ननक
आचार्य प्रशांत: बात बहुत सीधी है, गुण वह सब कुछ है जो किसी भी चीज़ के बारे में, घटना के बारे में, इंसान के बारे में कहा जा सकता है, वह गुण है׀

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जड़धीर्यदि |मनोरथान् प्रलापांश्र्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ||
अष्टावक्र गीता
(अध्याय १८, श्लोक ७५)

आचार्य प्रशांत: क्वांटम लीप का जो फिज़ीकल, भौतिक तात्पर्य है वो समझते हैं न? (श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए) भौतिकी किसका-किसका विषय रहा है?
प्रश्नकर्ता: स्कूल में, दसवीं कक्षा तक।
आचार्य: तो क्वांटम जम्प क्या होती है? क्वांटम थ्योरी ही क्या थी?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी भजन की बात करी हमने, मैं कबीर जी के श्लोक की किताब पढ़ रहा था, उसमें लिखा भी हुआ है कि जो व्यक्ति प्रभु का भजन नहीं करता वो बुद्धिहीन होता है, उसका जीवन अपवित्र होता है, तो हम ये बोल सकते हैं की इस संसार…

आचार्य प्रशांत: श्रद्धा क्या है? कभी-कभी आप लोग बोलते हो ना, और जब बोलते हो तो थोड़ी थकान हो जाती है, तो अचानक से मन कहता है, “चुप हो जाओ, इतनी बातें तो हैं ही उन्हीं को सुन लेंगे तो उत्तर मिल जाएगा।” अभी थोड़ी देर के लिये चुप हुआ…

“Ask and it shall be given to you, seek and you shall find, knock and it shall open unto you, For everyone who asks receives; he who seeks finds; and to him who knocks, the door will be opened।।।“
Mathew (7:7)
मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ो, तो

प्रश्नकर्ता: मुझेमूर्ति, ध्यान – इनमें आस्था है, क्या यह मुझे ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करेगा?
आचार्य प्रशांत: जब तक तुम अपने आप को देह समझते हो, जब तक अहम् , रूप से जुड़ा हुआ है,अभिज्ञात है, तब तक परम भी तुमको मूर्त रूप में ही दिखाई देगा।…

वक्ता: जो कुछ भी ज़िंदगी में कीमती है, इज्ज़त के लायक है, उसको अगर तुम कीमत देते हो, आदर देते हो तो उसका तुम कोई बहुत भला नहीं कर देते, उसका कोई हित नहीं हो जाता| क्योंकि वो ऊँचा है तभी तो कीमती है और जो पहले से ही ऊँचा…

आचार्य प्रशांत: पूरा जीवन अगर सुचारु नहीं है तो वो — ग्रंथ भी यही कहते हैं, मेरा भी अनुभव यही रहा है — कि फिर बड़ा मुश्किल हो जाएगा आचरण पर नियंत्रण कर पाना। आहार-विहार तो आचरण की ही बात है न – क्या खाया? क्या पिया? पूरी दिनचर्या, सारे…

आचार्य प्रशांत: शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं, जिन तक मन, मन रहकर पहुँच नहीं सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। ‘शक्ति’, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है। शक्ति में गति है, चंचलता है। शक्ति जीवन है, शक्ति वो सब कुछ…

श्रोता: सर, मेरी रीडिंग में ये था कि मैं इंटेलिजेंस और प्रभावों समझती हूँ लेकिन मैं फिर भी लोगों की तरफ प्रभावित हो जाती हूँ। इसमें मुझे यही समझ नहीं आ रहा कि मुझे कब पता चलेगा कि मैं प्रभावित हो रही हूँ या मुझे कब पता चलेगा कि ये…

प्रश्नकर्ता: आपने कहा था कि तुम्हें क्या पता कि जिसे खीर पसंद है, उसे घास भी पसंद हो सकती है। जैसे कि गीता में कहा है—“पत्रम्, पुष्पम्, फलम् तोयम्।” तो अगर हम प्रेम से भोग लगा रहे हैं, तो वो भी उसी श्रेणी की बात है क्या?
आचार्य प्रशांत: प्रेम…

श्रोता: सर, अभी दिमाग में ये चल रहा था कि ये बोलूँगी, ये बोलूँगी, ये बोलूँगी, ये बोलूँगी और फिर क्या हो जाता है पता नहीं? ये हो जाता है कि दबा लो, अन्दर रख लो?
वक्ता: देखो! तुम्हारे भीतर जो भी है, उसके साथ आत्मा भी तो है न?…

वक्ता: खलक सर नाम अपने को बहुत कर सर पटकता है
हमन गुरुनाम साँचा है , हमन दुनिया से यारी क्या।
गुरुनाम। कबीर का वो बड़ा अब्यूज्ड सा दोहा है:-

वक्ता: मीरा कहती हैं:
दास भक्त की दासी मीरा
रसना कृष्ण रटे

प्रश्नकर्ता: सर, इतनी जल्दी समर्पण क्यों कर देता हूँ? इतना कमज़ोर क्यों हूँ?
आचार्य प्रशांत: समर्पण करने में और घुटने टेकने में ज़मीन-आसमान का अंतर है!
घुटने टेकने का नाम नहीं है समर्पण, हारने का नाम नहीं है समर्पण, कमज़ोर हो जाने का नाम नहीं है समर्पण; समर्पण का अर्थ

बाहर से उज्जवल दसा, भीतर मैला अंग।
ता सेतो कौवा भला, तन-मन एक ही रंग।।
–दरियादास

जलि थलि महीअलि भरिपुरि
लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी
~ नितनेम

वक्ता: सवाल ये है कि समर्पण कैसे?
समर्पण तुम किस चीज़ का करते हो? समर्पण का अर्थ क्या है?
समर्पण का अर्थ होता है किसी चीज़ की मूल्यहीनता को जान लेना |

आचार्य प्रशांत: एक राजा थे, उनका नाम नहीं याद आ रहा अब। उनकी कहानी एक-दो बार मैं सुना भी चुका हूँ पहले। उनको यही था कि मौत लेने आती है। उनके सौ बेटे थे। कुछ ऐसा ही था।
श्रोता १: ययाति ।

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सके, निज मन समझो आय।।
संत कबीर

आचार्य प्रशांत: कोई कहता है कि, ‘नॉलेज एंड विज़डम डू नॉट गो टूगेदर (ज्ञान और बुद्धि एक साथ नहीं चलते)।‘ थोड़ा समझना पड़ेगा। इसका अर्थ ये नहीं है कि ‘दे आर म्यूचुअली एक्सक्लूसिव (दोनों परस्पर अनन्य हैं)‘, कि इन दोनों की आपस में कोई दुश्मनी है, कि जहाँ …

वक्ता: महावीर का हम सबने सुना है कि जब चलते थे तो कहते हैं कि उनके आस-पास छ: कोस तक कोई हिंसक घटना नहीं हो सकती थी। (वाक्य पर ज़ोर देते हुए) उनके आस-पास छ: कोस तक कोई हिंसक घटना नहीं हो सकती थी, होती ही नहीं थी। उन्हीं की…

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।
~ शांतिपाठ, ईशावास्य उपनिषद्

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास। पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास॥
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आदमी का मन किसी भी तरीके से अपनी बेहूदी चालाकियाँ छोड़ना नहीं चाहता। आप उसे एहसास कराओ कि तू अज्ञानी है तो वो कहेगा, ‘अच्छा, मैं ज्ञान हासिल कर लेता हूँ’ कौन

प्रश्न: सर, मेरी ज़िन्दगी में परिवर्तन नहीं आ रहा है। लगता है जैसे बातें तो समझ आती हैं परन्तु उन्हें जीवन में नहीं उतार पा रहा हूँ। कृपया सहायता करें।
वक्ता: अंदर-बाहर एक है! जो तीर चुभा हुआ है न, उसके दो सिरे होते हैं: एक भीतर का, एक…

प्रश्न: सर, जैसे अगर आप कहते हैं कि मैं पूरा हूँ। मतलब मेरे अन्दर ऐसा कुछ है कि मैं पूरा समझता हूँ कि मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूँ, पर मेरे ‘अन्दर’ नहीं है। तभी सर आप मुझे सिखा रहे हो। ऐसे ही सर कोई भी बात हो…

प्रश्न: सर, हम जब भी कोई फोटोग्राफ खींचते हैं तो वो फोटोग्राफ एक हिस्से की होगी, वो पूरे की नहीं हो सकती। एक हिस्से ही आएगा, पूरे का नहीं आ सकता। जब मुझे दिख ही एक हिस्सा रहा है तब मैं उसी चीज़ के बारे में बताऊँगा, बाकी का मुझे…

आचार्य प्रशांत: श्रीमद् भगवद् गीता, १८ वां अध्याय, ६६ व श्लोक।
"अर्जुन तुझे यह रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में तपरहित, भक्तिरहित और सुनने की इच्छा रखने वाले लोगों से नहीं कहना चाहिए। और जो मुझमें अर्थात कृष्ण में दोष दृष्टि रखता हो, उससे तो कभी नहीं कहना चाहिए।"

जेती देखौं आत्मा, तेता सालिगराम । साधू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सूं काम । ।
~ संत कबीर
वक्ता: जहाँ वास्तव में सत दिखाई दे, वही जगह पवित्र है। जिसमें वास्तव में सत्य की झलक मिले, वही व्यक्ति उसका प्रतिनिधि है। मंदिर वो नहीं है, जहाँ परम आकर बैठे।

शब्द न करे मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार। आपा पर जब चीनिहा, तब गुरु सिष व्यवहार॥
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति है, वह दो दिशा में मार करती है, “शब्द न करे मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार” इसको चाहे गुरु की तरफ से पढ़िए, चाहे शिष्य की तरफ

प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने अभी कहा कि परमात्मा सिर्फ़ एक होता है। लेकिन हमने अपनी ओर से देखा नहीं या जाना नहीं और जो भी पता है हमें, वो दूसरों के द्वारा ही पता चला है। तो हमें जब उसके बारे में कुछ पता ही नहीं, तो उससे प्रेम कैसे…

प्रश्नकर्ता: सर, जब हम वहाँ बैठे हुए थे, तो थोड़ी थकान-सी लग रही थी, और ठण्ड भी लग रही थी। फिर मेरे मन में सवाल उठा कि “मैं यहाँ क्यों हूँ?” शहर में ठाठ थी, कितने आराम से था। तब तो मैंने अपने मन को समझाया इस संदेह को लेकर।…

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार । तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ।। ~ कबीर
प्रश्न: संसार में मनुष्य जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता, जैसे वृक्ष से पत्ता जब झड़ जाये तो दोबारा डाल पर नहीं लगता। क्या…

जगत तरैया भोर की, सहजो ठहरत नाहि। जैसे मोती ओस की, पानी अंजुली माहि।। – सहजो बाई
वक्ता: अभी कबीर को पढ़ रहे थे तो लिखा था कि राम नहीं है, साधु ही है, जगत ही है। और यहाँ सहजो क्या कह रहीं हैं? कि जगत है जैसे भोर का…

मारग चलते जो गिरे, ताको नाही दोस । कहै कबीर बैठा रहे, ता सिर करड़ै कोस ॥ -कबीर
वक्ता: जो चलते हुए गिरता है उसका दोष नहीं है, जो बैठा रहता है उसके सिर पर कोटिक पाप हैं। क्या कह रहे हैं कबीर? आप क्लास लेने जाते हो, वहाँ कोई…

प्रश्न: सर, इस लेख में लिखा है, ‘भक्ति ज्ञान की माता है’। इसका क्या अर्थ है?
वक्ता: यहाँ पर ज्ञान से इनका मतलब है, ‘अंतिम अनुभूति’, और वो भक्ति के बिना नहीं हो सकता।
श्रोता १: क्या भक्ति, मुक्ति से भिन्न नहीं है?

टोटे में भक्ती करै, ताका नाम सपूत। मायाधारी मसखरै, केते गये अऊत।।
वक्ता: भक्ति का अर्थ ही होता है कि कुछ पाना है, कुछ है जो भजने योग्य है। और वो जो है, जो भज्य है, उसको पाना है। तलाश पाने के लिये ही होती है लेकिन उस तलाश में…

चतुराई चूल्हे पड़े, ज्ञान कथे हुलसाय। भाव भक्ति जाने बिना, ज्ञानपनो चली जाय॥ ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: भक्ति की ज्ञान पर श्रेष्ठता बता रहे हैं। तुम्हारे ज्ञान की दो कौड़ी की कीमत नहीं है यदि...?

जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ |
मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ||
वक्ता: जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ|

श्रोता १: सर, मैं वास्तव में इसी बात पर सोच रहा था| इस विषय पर, दोस्तों से ही, रात करीब ढाई बजे तक वार्तालाप हुई| सर मैं चाह रहा हूं, उसे स्पष्ट कर लूं|
मैं ये जानना चाहता हूं कि जो कुछ भी सच होता है, उस सच को क्या…
खोट मत ढूँढने…
श्रोता: इसमें लिखा हुआ है की मन को नियंत्रित करो |
आचार्य जी: इसमें लिखा है की तुम्हारी जागृति हुई नहीं है और तुमने तरीके अपना रखे…
आचार्य: अप्रत्याशित का तो…
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताए।
उसका अर्थ क्या है? काफ़ी ज्यादा?…
सोइ रसना
जो हरि गुण गावै
सवाल किया है कि रसना यानि ज़बान, जिह्वा की सार्थकता ईश्वर के गुण गाने में बताई गयी है। आशय क्या है हरि गुण से? और फिर जो…
वक्ता: सवाल यह है कि ‘तुम’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, ‘तुम्हीं विद्यमान हो,’…
आचार्य: ‘भाव भक्ति’ नहीं है। तुम्हारी सारी चतुराई चूल्हे…