प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कभी-कभी घबराहट-सी होती है, और अचानक गुस्सा आ जाता है। समझ नहीं आता क्या करूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: कोई बात नहीं।
गुस्सा आना कोई बुरी बात नहीं है, गुस्से के पीछे कारण सही रखो। जब लगता है कि कुछ मिल नहीं रहा है, जब लगता है कि कुछ खो रहा है, किसी लक्ष्य को चाहा था और उसकी प्राप्ति नहीं हो रही, तो गुस्सा उठता है। गुस्से की बात छोड़ो, गुस्से के नीचे वो लक्ष्य है, वो इच्छा, कामना है, जिससे जुड़े हुए हो। लक्ष्य ठीक रखो। जो ऊँचे-से-ऊँचा चाह सकते हो, उसको चाहो। फिर वो न मिले, और गुस्सा आ गया, तो कोई बात नहीं। दिक़्क़त तब है जब व्यर्थ, छोटी चीज़ चाही, और फिर वो चीज़ नहीं मिली तो गुस्सा किया।
पहले तो माँगी ही ऐसी चीज़ जो क्षुद्र है, टुच्ची है, बिलकुल अपने आप को उसमें निवेशित कर दिया, छोटी ही चीज़ के साथ एकदम लिपट गए। और फिर वो छोटी चीज़ भी नहीं मिली।
पहला तो गुनाह ये किया कि वो छोटी चीज़ माँगी। और दूसरी बात ये कि अकर्णमन्यता ऐसी, अविवेक ऐसा कि वो जो ज़रा-सी चीज़ माँगी, वो भी नहीं मिली। और फिर गुस्सा दिखा रहे हैं, हाथ-पाँव पटक रहे हैं। ये बड़ा अशोभनीय लगता है।
कुछ ऐसा माँगो जो तुम्हें अपने लिए संभव ही न लगता हो। फिर तुम्हें हार भी मिलेगी अपने प्रयत्न में, तो कोई बात नहीं। फिर तुम्हें आश्चर्य होगा कि – गुस्सा उठता क्यों नहीं? या उठता है तो इतना क्षीण क्यों है? या उठता भी है, तो इतना सात्विक क्यों है?

