जगत तरैया भोर की, सहजो ठहरत नाहि। जैसे मोती ओस की, पानी अंजुली माहि।। – सहजो बाई
वक्ता: अभी कबीर को पढ़ रहे थे तो लिखा था कि राम नहीं है, साधु ही है, जगत ही है। और यहाँ सहजो क्या कह रहीं हैं? कि जगत है जैसे भोर का तारा। कैसा होता है भोर का तारा? अभी है, अभी नहीं है। जैसे ओस की बूंद। कैसी होती है? अभी है, अभी नहीं है। और जैसे पानी अंजुली में भरा हुआ। कैसा होता है? अभी है, अभी नहीं है। कैसे साथ बैठाइयेगा इन दोनों बातों को? कबीर कह रहे हैं कि जो बैकुंठ है, सो नकली है। सहजो कह रहीं हैं कि ये संसार जो है तुम्हारा, ये फिसलता हुआ है, ये नकली है।
श्रोता १: लेकिन सर, दोनों में से किसी ने भी ये तो नहीं कहा है कि साधु नहीं है। साधु तो तब भी था, और इस जगत में भी है।
वक्ता: क्यों किसी साधु से आज मिलो, और फ़िर से कल मिलने जाओ, तो हो सकता है कि मरा पड़ा हो।
श्रोता १: साधु मात्र किसी शरीर का नाम थोड़ी ही है।
वक्ता: तो फिर किसका नाम है? कबीर नहीं खुश होंगे ये बात सुनकर। अगर साधु शरीर का नाम नहीं है, तो फ़िर क्या है? फिर तो तुमने साधु को वही बना दिया; अदृश्य, निराकार, अनिर्वचनीय।



