जहाँ मन आत्मस्थ हो जाए, मात्र वही जगह मंदिर कहलाए || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)

जेती देखौं आत्मा, तेता सालिगराम । साधू प्रतषि देव हैं, नहीं पाथर सूं काम । ।
~ संत कबीर
वक्ता: जहाँ वास्तव में सत दिखाई दे, वही जगह पवित्र है। जिसमें वास्तव में सत्य की झलक मिले, वही व्यक्ति उसका प्रतिनिधि है। मंदिर वो नहीं है, जहाँ परम आकर बैठे। जहाँ परम हो वो मंदिर है। अंतर समझिएगा। जहाँ हमने सिर को झुका दिया…?
श्रोता १: वहाँ एक काबा बना दिया।
वक्ता: वहीं एक काबा बना दिया। जहाँ आत्मा के दर्शन हों, जिस देह में, जिस पदार्थ में, वही सालिगराम है। जिस व्यक्ति में परम दिख जाए, वही पवित्र है। पवित्रता का और कोई पैमाना नहीं हो सकता। तो कह रहे हैं कबीर कि – सिर झुकाना है तो उस देह के सामने झुकाओ, जिसके देखने मात्र से परम की अनुभूति होती है।
कौन है ‘संत’? ‘संत’ वही है, जिसको देख कर परमात्मा की याद आए। कौन है ‘महात्मा’? वही जो जब सामने आए तो ये विश्वास -सा होने लगे कि परमात्मा होता होगा। इसका होना इस बात का प्रमाण है कि परमात्मा होता होगा। अगर परमात्मा ना होता, तो ये नहीं हो सकता था – बस वही महात्मा है, वही संत है।



