जो डूबने से डरते हैं, गहराइयाँ उनके लिए नहीं है || आचार्य प्रशांत (2016)

आचार्य प्रशांत: शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं, जिन तक मन, मन रहकर पहुँच नहीं सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। ‘शक्ति’, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है। शक्ति में गति है, चंचलता है। शक्ति जीवन है, शक्ति वो सब कुछ है, जिससे आप एक मनुष्य हो कर के संबंध रख सकते हैं। शक्ति भाव है, शक्ति विचार है, शक्ति में संसार के सारे उतार-चढ़ाव हैं, आँसू हैं और मुस्कुराहटें हैं।
इन नौ दिनों में, नवरात्र में, शक्ति के नौ रूपों की पूजा बताती है हमको कि संसार के, जीवन के, समस्त रूप पूजनीय हैं। और वो बहुत कुछ हमको धर्म के विषय में सिखा जाती है। कहा गया है हमसे कि सत्य अरूप है, अचिन्त्य है, निर्गुण है, निराकार है। लेकिन जब आप शक्ति के नौ रूपों को पूजते हो, तो उससे आपको एक आगे की बात कही जाती है। ऐसी बात जो ज़्यादा सार्थक, व्यवाहरिक, और उपयोगी है।
सत्य होगा अरूप, पर हम रूपों में जीते हैं। सत्य होगा अचिन्त्य, पर हम विचारों और भावों में जीते हैं। सत्य होगा निराकार, पर हम तो आकार और रंग और देह में जीते हैं। सत्य होगा असीम, पर हमारा तो सब कुछ ही सीमित है। जिन्होनें असीम की पूजा शुरू कर दी, जिन्होंने निर्गुण, निराकार को पकड़ने की चेष्टा कर ली, जिन्होंने ये कह दिया कि वो सब कुछ जो प्रकट और व्यक्त है, वो तो क्षुद्र है और असत्य है, उन्होंने जीवन से ही नाता तोड़ लिया। उनका मन बिलकुल शुष्क और पाषाण हो गया। अरूप तक जाने का एकमात्र मार्ग रूप है। सत्य तक जाने का हमारे लिए एक मात्र मार्ग संसार है।
शिव के अन्वेषण का एकमात्र मार्ग शक्ति है। जिन्होंने संसार से किनारा कर लिया, ये कह कर कि संसार तो सत्य नहीं, उन्होंने संसार को तो खोया ही, सत्य से भी और दूर हो गए।
शक्ति के नौ रूप बताते हैं हमको कि जीवन अपने समस्त रंगों में सम्माननीय है, प्यारा है, पूजनीय है। धर्म जीवन को काटने की बात नहीं है, कि कुछ बातों का, कुछ मुद्दों का, कुछ पहलुओं का, कुछ रंगों का निषेध कर दिया। करा जा सकता है, सीखा जा सकता है।
