प्रश्न: सर, मेरी ज़िन्दगी में परिवर्तन नहीं आ रहा है। लगता है जैसे बातें तो समझ आती हैं परन्तु उन्हें जीवन में नहीं उतार पा रहा हूँ। कृपया सहायता करें।
वक्ता: अंदर-बाहर एक है! जो तीर चुभा हुआ है न, उसके दो सिरे होते हैं: एक भीतर का, एक बाहर का। भीतर वाले को पूरी तरह निकालोगे तो भी बाहर वाला हट जाएगा; और बाहर से पूरी तरह खींचोगे तो भी भीतर से निकल जाएगा। पर बहुत कष्टप्रद स्थिति हो जाती है। कभी अनुभव किया है कि पाँव में काँटा लगा और वो टूट कर अंदर ही रह गया? हुआ है किसी के साथ कि काँटा लगा और टूट गया? अगर काँटा ऐसा लगा हो तीर की तरह—थोड़ा अंदर है, बाकी बाहर है—तो निकालना आसान है।
पर हम यहीं चूक कर जाते हैं। जो अंदर भी था और जो बाहर भी था, उसमें से सिर्फ़ बाहर वाले हिस्से को निकाल दिया। अब जो अंदर है, वो तो अभी अंदर है ही, अब उसको निकालना और भी मुश्किल है।
अंदर-बाहर एक है!
जब बाहर से निकालो, तो सिर्फ़ बाहर का मत निकाल दो, भीतर से भी निकल जाने दो।
तुम किसी से दूर हटते हो तो उसके चेहरे से दूर हो जाते हो, उसके शरीर से दूर हो जाते हो, पर भीतर में उसको बिठाए रखते हो। अब काँटा कहाँ लगा हुआ है? अंदर ही अंदर लगा हुआ है। तीर टूट गया है।
ऐसा अनाड़ी तुम्हारा चिकित्सक था: तुम गए दिखाने कि छाती में तीर लगा हुआ है, उसने क्या किया? आरा लेके बाहर से काट दिया! और वहाँ *बैंड


