दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावे दास। पानी के पीये बिना, कैसे मिटे पियास॥
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आदमी का मन किसी भी तरीके से अपनी बेहूदी चालाकियाँ छोड़ना नहीं चाहता। आप उसे एहसास कराओ कि तू अज्ञानी है तो वो कहेगा, ‘अच्छा, मैं ज्ञान हासिल कर लेता हूँ’ कौन ज्ञान हासिल कर लेगा? "मैं, मैं ज्ञान हासिल कर लेता हूँ।" ज्ञान मिल गया, और मैं, मैं का मैं ही रहा। पहले अज्ञानी-मैं था अब और अच्छा है, अब कौन सा मैं है?
प्रश्नकर्ता: ज्ञानी मैं।
आचार्य: अब ज्ञानी 'मैं' है। अब तो कोई उँगली भी नहीं उठा सकता कि 'मैं' को तोड़ो, ज्ञानी-मैं है। ज्ञान में भी प्यारे-से-प्यारा वाक्य अगर कोई है जो मैं को अच्छा लगता है तो वो है—‘अहं ब्रह्मास्मि ‘ या ‘सोऽहं ‘ या ‘अयं आत्मम ब्रह्म ‘ यह वाक्य बड़े अच्छे लगते हैं ज्ञान में। क्यों?
मैं ब्रह्म हूँ। मैं कौन हूँ? मैं तो वही हूँ जो मैं था और अब मैं एक चीज़ और हो गया, क्या? ब्रह्म। बड़ा अच्छा लगता है, बड़ा प्यारा लगता है। सोऽहं; ब्रह्म में तो फिर भी नाम दे दिया; अब और ऊँचा हो गया, 'वह जिसका नाम भी नहीं लिया जा सकता वो मैं हूँ!' बड़ा अच्छा लगता है। ‘अप्प दीपो भव ’—मैं स्वयं ज्योति हूँ अपनी। कौन ज्योति है? 'मैं!' 'जीवन को देखूँगा मैं अपनी दृष्टि से' – बड़ा अच्छा लगता है। इसीलिए अहंकारियों का साधना में उतरना अधिकांशतः ज्ञान मार्ग से होगा।




