कृष्ण को चुनने दो कि कृष्ण का संदेश कौन सुनेगा || श्रीकृष्ण पर (2015)

आचार्य प्रशांत: श्रीमद् भगवद् गीता, १८ वां अध्याय, ६६ व श्लोक।
"अर्जुन तुझे यह रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में तपरहित, भक्तिरहित और सुनने की इच्छा रखने वाले लोगों से नहीं कहना चाहिए। और जो मुझमें अर्थात कृष्ण में दोष दृष्टि रखता हो, उससे तो कभी नहीं कहना चाहिए।"
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि, "अर्जुन जो बातें मैं तुझसे कह रहा हूँ, यह कभी भी तपरहित, भक्तिरहित, और सुनने की इच्छा न रखने वाले लोगों से कभी मत कहना। और जो मुझमें दोष दृष्टि रखता हो, जो कृष्ण से भी ऊँचा कुछ और समझता हो, उससे तो बिलकुल मत कहना।"
तो सवाल पूछा है कि, "आजकल अद्वैत के सन्देश हम सब मिलकर औरों तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं, उनमें से अधिकांशत: ऐसे हैं जो सुनना चाहते नहीं। आप कहते हैं कि जिनको प्रकाश की ज़रुरत सबसे ज़्यादा है वह प्रकाश से सबसे ज़्यादा दूर भागेंगे। और यहाँ कृष्ण कह रहे हैं कि जिसे प्रकाश चाहिए नहीं, उसे प्रकाश दो नहीं। क्या समझें?"
किसे चाहिए, किसे मिलेगा, किसे नहीं मिलेगा, यह फैसला कृष्ण को करने दो न, या तुम करोगे? कृष्ण कह रहे हैं कि जो तपरहित, भक्तिरहित हैं, उन तक मेरी बातें मत पहुँचाना। तुम पहुँचा सकते हो क्या? तुम पहुँचा सकते ही नहीं। तुम अथक कोशिश कर लो तब भी तुम पहुँचा नहीं पाओगे।
कृष्ण तक तो कृष्ण की ही बात पहुँचेगी और कृष्ण की इच्छा से ही पहुँचेगी।



