बाहरी चुनौतियों से लड़ो और आंतरिक चुनौतियों को भूल जाओ || आचार्य प्रशांत (2016)

आचार्य प्रशांत: एक राजा थे, उनका नाम नहीं याद आ रहा अब। उनकी कहानी एक-दो बार मैं सुना भी चुका हूँ पहले। उनको यही था कि मौत लेने आती है। उनके सौ बेटे थे। कुछ ऐसा ही था।
श्रोता १: ययाति ।
वक्ता: हाँ, ययाति की कथा। काम हुआ है बताइए पूरा? सुनाइए, कहानी सुनाइये।
श्रोता १: एक राजा थे और उसके सौ पुत्र थे। उस राजा की मौत आई एक उम्र में; पूरी उम्र हो गयी थी। जब मौत आई तो राजा ने कहा कि अभी मैंने तो कुछ भोगा ही नहीं है। मौत ने कहा कि अब तो तुम्हें जाना पड़ेगा। लेकिन हम आपको कुछ वर्ष और दे देंगे बशर्ते आप अपने परिवार के किसी एक पुत्र का जीवन दिलवा दो। जब राजा अपने बेटों के पास गया तो उसका कोई भी बेटा तैयार नहीं हुआ। जो सबसे छोटा बेटा था वो तैयार हुआ, यह सोचकर कि ‘जब इनको कुछ नहीं मिला तो मैं क्या करूंगा जी कर’। और इसी तरह यह सिलसिला चलता रहा।
वक्ता: ऐसे करते-करते उसने सबका जीवन ले लिया। हर बार जब यम छोड़कर जाएँ, तो इनकी ज़िन्दगी में कुछ साल बढ़ाते जाएँ। फ़िर जब आखिरी भी ख़त्म हो गया। यही है न?
श्रोता १: आख़िरी पुत्र भी जब ख़त्म हो गया और फिर जब मृत्यु आयी, तब राजा ने कहा कि अब मुझे केवल एक पंक्ति लिखने दो। और वो पंक्ति थी: “कभी भी आग में घी डालने से आग शांत नहीं होती”।

