श्रद्धा है विश्वास की परिपूर्ति || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जड़धीर्यदि |मनोरथान् प्रलापांश्र्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ||
अष्टावक्र गीता
(अध्याय १८, श्लोक ७५)
आचार्य प्रशांत: किसका है यह? क्या करें इसका |
श्रोता: इसमें लिखा हुआ है की मन को नियंत्रित करो |
आचार्य जी: इसमें लिखा है की तुम्हारी जागृति हुई नहीं है और तुमने तरीके अपना रखे है मन को पकड़ने के| मन का निग्रह करने के, मन का निरोध करने के तरीके तुमने पकड़ रखे है | तो अष्टावक्र तुमसे कह रहे है जैसे ही उन तरीकों को छोड़ोगे तुम दुबारा वही पहुँच जाओगे, जैसे तुम थे | तरीके काम नहीं करेंगे | तरीकों से अगर कुछ बदलाव आया है तो तरीके के जाते ही चला जायेगा| समझे बात को? तरीका वहीँ अच्छा जो तरीके से मुक्त कर दे |
तरीका वहीँ अच्छा जो तरीके से मुक्त कर दे |




