Upanishads

What is Dharma? - Bhagavad Gita
What is Dharma? - Bhagavad Gita
11 min

Overview

Fighting Duryodhana is Dharma. Fight Duryodhana in the way you can, that is swadharma. Dharma is the same for everybody, but swadharma varies according to your physical, social, temporal conditions. But remember that swadharma can never be in contradiction of Dharma; swadharma will always be something

Vidyarthi Jeevan
Vidyarthi Jeevan
1 min
युवावस्था बहुत ही नाज़ुक समय होता है। यही समय निर्धारित कर देता है कि जीवन किस दिशा जाएगा।
आपके मूड को कौन नियंत्रित करता है?
आपके मूड को कौन नियंत्रित करता है?
3 min
हमारा मिजाज हमेशा दूसरों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। नतीजे आपकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। इसलिए अब आपको मनोबल बढ़ाने वाले किसी प्रेरक वक्ता की ज़रूरत है। जैसे ही वह व्यक्ति चला जाता है, आपकी ऊर्जा भी थम जाती है। लेकिन जीने का एक और तरीका भी है। अपने भीतर गहराई में, मुझे एक ऐसा बिंदु मिलता है जिसे कोई बाहरी परिस्थिति छू नहीं सकती। जो कुछ भी होता है, वह सतह पर ही घटित होता है। वह स्थिर, उदासीन और तटस्थ बना रहता है। तब आप सचमुच स्वतंत्र होते हैं।
राजनीति में अध्यात्म क्यों ज़रूरी?
What Would Today’s Buddha Look Like?
hindi
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1 min
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मौत से मुँह छुपाने वाले || आचार्य प्रशांत (2019)
मौत से मुँह छुपाने वाले || आचार्य प्रशांत (2019)
5 min

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं

संत वो जो तुम्हें विशुद्ध तुम ही बना दे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
संत वो जो तुम्हें विशुद्ध तुम ही बना दे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
6 min

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब

प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति

इन्द्रियों पर विजय कैसे प्राप्त करें? कर्म और अकर्म क्या?
इन्द्रियों पर विजय कैसे प्राप्त करें? कर्म और अकर्म क्या?
16 min

श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,

Pradip Test Hindi
Pradip Test Hindi
1 min
सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
15 min

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।

तो

A very special happiness  || Neem Candies
A very special happiness || Neem Candies
1 min

The Upanishads were not composed to give you the normal kind of comfort and happiness. The Upanishads are there to give you an exalted happiness, a transcendental happiness, an eternal happiness. A happiness so rare and exquisite that it is not called as harṣa or moda or prasannatā; a

सफलता की असली कुंजी || नीम लड्डू
सफलता की असली कुंजी || नीम लड्डू
1 min

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८

How is Vedanta different from philosophy? || Delhi University (2022)
How is Vedanta different from philosophy? || Delhi University (2022)
14 min

Questioner (Q): I am studying philosophy at Hansraj College, and I have read that Hegel’s philosophy was that mankind has been increasing its power by increasing its knowledge about itself and its surroundings. This kind of a philosophy might suggest that our projected purpose is to become the most powerful

Vedanta offers you the power to change || IIT Delhi (2022)
Vedanta offers you the power to change || IIT Delhi (2022)
13 min

Questioner (Q): Does Vedanta, or wisdom literature in general, offer any fundamental solutions to the problems that we face as normal individuals in our personal and professional lives?

Acharya Prashant (AP): Vedanta doesn’t go at all into the specifics of the problems we face. If it does that, it would

हमारी असली पहचान क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
हमारी असली पहचान क्या? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
40 min

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥

जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।

देह - हमारी साथी या बंधन? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
देह - हमारी साथी या बंधन? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
39 min

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥

वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता

उपनिषद् क्यों अनिवार्य हैं? || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
उपनिषद् क्यों अनिवार्य हैं? || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
14 min

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है।

बाहर सत्य के दर्शन होना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
बाहर सत्य के दर्शन होना || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
20 min

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥

वह परमपुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय ३, श्लोक १६)

आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के

मन की बेचैनी - सत्य का प्रमाण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
मन की बेचैनी - सत्य का प्रमाण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
16 min

नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥

वह परम-पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देह रूपी नगर में अंतर्यामी होकर स्थित है। वही इस बाह्य-स्थूल जगत में लीला कर रहा है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १८)

आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही

मुक्ति - एक अनोखी मृत्यु! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
मुक्ति - एक अनोखी मृत्यु! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
18 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत बिग-बैंग से हुई थी। तो क्या अध्यात्म में जो आंतरिक जगत की बात है और ये

सभी परम के रूप हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
सभी परम के रूप हैं || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब

The one who transcends death knows the world and the self || On Advaita Vedanta (2019)
The one who transcends death knows the world and the self || On Advaita Vedanta (2019)
8 min

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥

andhaṁ tamaḥ praviśanti ye'vidyāmupāsate tato bhūya iva te tamo ya u vidyāyāṁ ratāḥ

They enter into a blinding darkness who worship avidyā; into still greater darkness, as it were, do they enter who delight in

सुख मन को क्यों भाता है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
सुख मन को क्यों भाता है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
14 min

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?

आचार्य प्रशांत: दुःख का अभाव।

पहले हाँ नहीं, ना बोला जाता है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
पहले हाँ नहीं, ना बोला जाता है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
20 min

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥

वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,

Prakriti can be helped only by the one who is not Prakriti || On Advaita Vedanta (2019)
Prakriti can be helped only by the one who is not Prakriti || On Advaita Vedanta (2019)
3 min

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्‌ । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्‌ व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥

sa paryagācchukramakāyamavraṇamasnāviraṁ śuddhamapāpaviddham kavirmanīṣī paribhūḥ svayambhūryāthātathyato'rthān vyadadhāt śāśvatībhyaḥ samābhyaḥ

He, the self-existent One, is everywhere; the pure one, without a (subtle) body, without blemish, without muscles, holy and without the taint of sin; the all-seeing, the all-knowing, the all-encompassing

कभी कुछ समझ से चाहो तो! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
कभी कुछ समझ से चाहो तो! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
19 min

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥

मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद्

घट-घट में बसा है वो || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
घट-घट में बसा है वो || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
23 min

ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम्‌। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥

जो उस जीवजगत से परे हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, जो अत्यंत व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे

The mind is your shadow || On Advaita Vedanta (2019)
The mind is your shadow || On Advaita Vedanta (2019)
6 min

Questioner: You mentioned that mumukṣā (deep desire for liberation) is what matters when we choose a path for liberation. But the mind is always playing games. Once I do things against its comfort, it tries to make up stories, create random, non-existent problems for me. Should I listen to my

संवेदनशीलता ही प्रेम है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
संवेदनशीलता ही प्रेम है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13 min

पुरुष एवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥

जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यकाल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १५)

आचार्य

बाहर भी वही, भीतर भी वही || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
बाहर भी वही, भीतर भी वही || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
12 min

सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥

वह परमात्मा सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत को सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर (सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर हृदयाकाश में स्थित है।

~

If you are to be loyal to the Truth, learn to be disloyal to yourself || On Advaita Vedanta (2019)
If you are to be loyal to the Truth, learn to be disloyal to yourself || On Advaita Vedanta (2019)
7 min

Questioner: I see myself rooted in habit, and I procrastinate real work by thinking that the real happens on its own. Please talk about breaking habits and living a more aware life.

Acharya Prashant: Habits will remain. As long as you are alive, habits will remain. You know what is

कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13 min

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥

पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।

यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसी: पुरुषं जगत्‌॥

हे हिमालयवासी सुखदाता!

The real glory of Nachiketa || On Advaita Vedanta (2019)
The real glory of Nachiketa || On Advaita Vedanta (2019)
10 min

Questioner: In Katha Upanishad, the young boy Nachiketa attained the highest wisdom and immortality by the virtue of dispassion and the firm resolve to know the Truth. Kindly speak on the virtues of determination and dispassion that Nachiketa had.

Acharya Prashant: Yes, obviously Nachiketa had determination and dispassion, but

तुम्हारी चाहत में जान कितनी है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
तुम्हारी चाहत में जान कितनी है? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
9 min

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्या चेतना और सत्य भिन्न हैं? ये विवेक क्या होता है?

आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है सत्य। तो हम जैसे हैं, जीव की जो स्थिति होती है, उसमें चेतना और सत्य बिलकुल भी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

सत्य

जो त्याग बोध से उठे || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
जो त्याग बोध से उठे || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
9 min

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहता्॥

वह परम पुरुष समस्त इंद्रियों से रहित होने पर भी उनके (इंद्रियों के) विषय-गुणों को जानने वाला है। सबका स्वामी-नियंता और सबका बृहद् आश्रय है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १७)

आचार्य प्रशांत: वह परम पुरुष, वह शुद्ध-मुक्त चेतना इंद्रियों द्वारा लाए

सतह में व्याकुलता और गहराई में चैन || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
सतह में व्याकुलता और गहराई में चैन || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13 min

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः।।

वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वही इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय

Truth will not answer the false, but the Guru will || On Advaita Vedanta (2019)
Truth will not answer the false, but the Guru will || On Advaita Vedanta (2019)
11 min

Questioner: Wherever I find myself entering into conversations with people, I am often asked questions such as ‘How are you?’, ‘How was your day?’, ‘Where are you from?’, ‘What are your hobbies and interests?’. Any answer that I give I know to be ultimately false. Answers such as ‘I am

तुम्हारी सीमा ही तुम्हारा दुःख है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
तुम्हारी सीमा ही तुम्हारा दुःख है || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
5 min

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥

वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वहीं इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय

तुम कभी मरते नहीं || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
तुम कभी मरते नहीं || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
5 min

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥

वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,

Knowledge of the self is freedom from the self || On Advaita Vedanta (2019)
Knowledge of the self is freedom from the self || On Advaita Vedanta (2019)
11 min

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥

anyatra dharmādanyatrādharmādanyatrāsmātkṛtākṛtāt anyatra bhūtācca bhavyācca yattatpaśyasi tadvada

Nachiketa said: That which you see as other than righteousness and unrighteousness, other than all this cause and effect, other than what has been and what is to be—tell me, that.

~ Katha Upanishad,

बस दो विकल्प होते हैं - दुःख या ब्रह्म || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
बस दो विकल्प होते हैं - दुःख या ब्रह्म || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
13 min

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥

जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वह अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,

ख़ास अनुभव की चाहत! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
ख़ास अनुभव की चाहत! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
5 min

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति।।

जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३,

Hear, concentrate, meditate, dissolve || On Advaita Vedanta (2019)
Hear, concentrate, meditate, dissolve || On Advaita Vedanta (2019)
8 min

इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या संभावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत् ॥

itthaṃ vākyaistathārthānusandhānaṃ śravaṇaṃ bhavet yuktyā saṃbhāvitatvānusandhānaṃ mananaṃ tu tat

‘To listen’, thus is to pursue by means of sentences their import. On the other hand, ‘thinking’ consists in perceiving its consistency with reason.

~ Adhyatma Upanishad, Verse 33

ऋषियों ने निर्गुण के गुण क्यों बताए? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
ऋषियों ने निर्गुण के गुण क्यों बताए? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
27 min

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो जैसे? अनिकेत। अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहे हैं, एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से

निराश्रित और सबका प्रथम कारण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
निराश्रित और सबका प्रथम कारण || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
8 min

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोअस्ति कष्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरूषेण सर्वम्॥

जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल जो आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण

Knowing that you will lose, fight as if you have already won || On Advaita Vedanta (2019)
Knowing that you will lose, fight as if you have already won || On Advaita Vedanta (2019)
5 min

निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥

nidrāyā lokavārtāyāḥ śabdāderātmavismṛteḥ kvacinnāvasaraṃ dattvā cintayātmānamātmani

Without granting for a moment even a toe-hold for sleep, gossip, verbal exchanges, etc., and self-forgetfulness, meditate on the Self in the self.

~ Adhyatma Upanishad, Verse 5

✥ ✥ ✥

Questioner: I am not sure

संसार है रसोई और परमात्मा है पकवान || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
संसार है रसोई और परमात्मा है पकवान || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
8 min

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदनं पूणं पुरुषेण सर्वं॥

जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण विश्व संव्याप्त है।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय

सामर्थ्य सीमित, पर लक्ष्य असीमित || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
सामर्थ्य सीमित, पर लक्ष्य असीमित || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
10 min

प्रश्नकर्ता: क्या जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना ही ब्रह्म को पाना है? जीवन के पार भी कुछ है?

आचार्य प्रशांत: जीवन के पार कुछ भी नहीं है। ठीक है? बिलकुल इस भ्रांति से बाज आ जाइए कि अध्यात्म जीवन के पार या मृत्यु के पार इत्यादि किसी अन्य

From the gross to the subtle || On Advaita Vedanta (2019)
From the gross to the subtle || On Advaita Vedanta (2019)
11 min

क्रियानाशाद्भवेच्छिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः । वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥

kriyānāśādbhavecchintānāśo'smādvāsanākṣayaḥ vāsanāprakṣayo mokṣaḥ sā jīvanmuktiriṣyate

The destruction of action leads to that of thought; thence results the dwindling of innate impulse (to act). The obliteration of innate impulse is liberation; it is held to be freedom in life.

~ Adhyatma Upanishad, Verse 12