प्रश्न: सर, जैसे अगर आप कहते हैं कि मैं पूरा हूँ। मतलब मेरे अन्दर ऐसा कुछ है कि मैं पूरा समझता हूँ कि मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूँ, पर मेरे ‘अन्दर’ नहीं है। तभी सर आप मुझे सिखा रहे हो। ऐसे ही सर कोई भी बात हो जहाँ मुझे ऐसा लग रहा है कि ये बंदा अभी सही नहीं जा रहा है। वह मेरा रिश्तेदार भी हो सकता है या मेरे पापा ही क्यों नहीं हों या मेरी बेहन या माँ ही क्यों नहीं हैं। सर वो गलत कर रहे हैं और मुझे पता है कि वो गलत कर रहे हैं, तो क्या बताऊंगा नहीं मैं उन्हें?
वक्ता: बिल्कुल। बिल्कुल। बिल्कुल ठीक बोला। पर दूसरों को ये बता पाने के लिए कि उनके लिए क्या सही गलत है, पहले मुझे ये तो पता हो कि मेरे लिए क्या सही गलत है। तुम्हें ये पता है तुम्हारे लिए क्या सही गलत है?
श्रोता १: सर, कई बार ऐसा होता है कि हमें पता भी होता है फ़िर भी हम वो नहीं करते।
वक्ता: और हमने क्या कहा है कि जब भी कभी आग लगेगी और तुम कहोगे कि मैं कुछ नहीं कर रहा, इसका मतलब कि तुम्हें पता ही नहीं है। तो हमें खुद ही नहीं पता है कि हमारे लिए क्या सही गलत है तो हम औरों को क्या बतायेंगे कि उनके लिए क्या सही गलत है।
जिस आदमी को ये न पता हो कि उसके लिए क्या ठीक है, वो औरों के लिए क्या ठीक है ये जान सकता है क्या? गड़बड़ हो गयी न।
श्रोता २: सर, आपने कहा कि किसी से अपेक्षा नहीं रखनी। अगर कोई अपेक्षा नहीं रखता, तो वो इंसान कैसा है?

