श्रोता: सर, मेरी रीडिंग में ये था कि मैं इंटेलिजेंस और प्रभावों समझती हूँ लेकिन मैं फिर भी लोगों की तरफ प्रभावित हो जाती हूँ। इसमें मुझे यही समझ नहीं आ रहा कि मुझे कब पता चलेगा कि मैं प्रभावित हो रही हूँ या मुझे कब पता चलेगा कि ये मैंने इंटेलिजेंस से किया है? दोनों में अंतर कैसे कर पाएँगे?
वक्ता: तुम जब पूछ रही हो कि इन दोनों में अंतर कैसे कर पाएँगे, तो तुम क्या चाह रही हो समझो।तुम पूछ रही हो कि कैसे पता चले कि कब इंटेलिजेंस काम कर रही है और कब प्रभाव? दोनों में अंतर कैसे कर पाएं? सुनने में ये ऐसा लगता है कि बड़ा वाजिब सवाल है लेकिन बात को समझना।तुम ये चाह रही हो कि ‘हिबा’ (प्रश्नकर्ता) है, ठीक है।और हिबा पता लगा ले कब इंटेलिजेंस काम कर रही है और कब प्रभाव काम कर रहे हैं? किसको पता लगाना है?
श्रोतागण: हिबा।
वक्ता: हिबा को पता लगाना है।तुम्हारी कल्पना ये है, तुमने मान ये रखा है कि ‘हिबा’ ये पता लगा सकती है।अब हिबा चाहती है कि, ‘’मैं तो ‘हिबा’ ही रहूँ लेकिन मुझे ये पता लगने लग जाए कि मेरे ऊपर कौन-कौन से प्रभाव काम कर रहे हैं?’’ हिबा चाह ये रही है कि, ‘’मैं तो हिबा ही रहूँ लेकिन इस हिबा को अक्ल आ जाए।’’ ये हिबा होशियार हो जाए।इस हिबा को पता लगने लग जाए कि, ‘’मेरे ऊपर कब प्रभाव काम कर रहे हैं और कब इंटेलिजेंस से काम चल रहा है।’’ ये हो नहीं सकता न क्योंकि अगर आज तक हिबा को पता नहीं लगा तो कल कैसे पता लग जाएगा? हिबा तो हिबा ही है।
जिसे पता लगेगा, उसे तो कुछ और ही होना पड़ेगा न।देखो, इस तरह के जितने सवाल होते हैं, उसमें एक बहुत मूल भूल हम कर देते हैं।हम हमेशा ये पूछते हैं कि, “मैं करूँ क्या? या मुझे पता कैसे लगे? मैं जानूं कैसे?” इन सब में हम चाह ये रहे होते हैं कि ये जो मेरा ‘मैं’ हैं, ये यथावत रहे। इसमें कुछ नहीं बदलना चाहिए।“मुझे कष्ट से मुक्ति कैसे मैले?” इसमें तुम क्या चाह रहे हो? मैं ‘मैं’ रहूँ और फिर भी कष्ट न रहे।“मुझे ये स्पष्टता कैसे मिले?” तुम क्या चाह रहे हो? “मुझे ज़िन्दगी में प्रेम कैसे मिले?” तुम क्या चाह रहे हो? जल्दी बोलो क्या चाह रहे हो क्योंकि हम सब यही करते हैं?

