चतुराई चूल्हे पड़े, ज्ञान कथे हुलसाय। भाव भक्ति जाने बिना, ज्ञानपनो चली जाय॥ ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: भक्ति की ज्ञान पर श्रेष्ठता बता रहे हैं। तुम्हारे ज्ञान की दो कौड़ी की कीमत नहीं है यदि...?
प्रश्नकर्ता: भाव भक्ति ना हो।
आचार्य: ‘भाव भक्ति’ नहीं है। तुम्हारी सारी चतुराई चूल्हे में गई, और ज्ञान में लग गई आग! भक्ति तुझमें है नहीं, भाग सके तो भाग!
‘भाव भक्ति जाने बिना, ज्ञानपनो चली जाय’। भक्ति के बिना तुम्हारा ज्ञान किसी काम का नहीं है। देखिए ऐसा नहीं है कि ज्ञान की कोई कीमत नहीं है। थोड़ी ही देर पहले कबीर ने कहा था, ‘ज्ञान-ध्यान का साबुन लगेगा’, ठीक है? ज्ञान अपने-आप में अद्भुत, विलक्षण, बहुत-बहुत कीमती है। लेकिन आख़िरी कदम पर आकर ज्ञान को भक्ति में रुपांतरित होना ही पड़ेगा। ठीक इसी तरह से भक्ति भी ज्ञान के बिना अगर हो रही है, तो बड़ी पाखंडी भक्ति है। बात को समझे बिना ही अगर आप समर्पित हो गए तो वो भी बहुत बड़ा पाखंड है। समर्पण आवश्यक है, पर जब समझा ही नहीं तो समर्पण कैसे कर रहे हो? फिर तो यह अंधा समर्पण है।
प्र: सिर्फ़ माने जाने वाला।
आचार्य:

