वक्ता: सवाल ये है कि समर्पण कैसे?
समर्पण तुम किस चीज़ का करते हो? समर्पण का अर्थ क्या है?
समर्पण का अर्थ होता है किसी चीज़ की मूल्यहीनता को जान लेना |
समर्पण ऐसा है, जैसे पेड़ से पत्ते का झड़ जाना | उसकी अब कोई उपयोगिता, कोई सार्थकता नहीं है, तो वो गिर जाता है| यदि और ज़्यादा तीखा उधारण लेना चाहते हो, तो समर्पण ऐसा है जैसे तुम्हारे हाथ में जलता हुआ कोयला हो और तुम उसको छोड़ दो | समर्पण की छवियों से बंध कर मत रह जाओ | हमारे मन में समर्पण की कुछ ऐसी छवि है कि कोई गुरुदेव है और जा कर के उनको चरणों में नमन कर दिया, समर्पण कोई ऐसी बात होती है | तुमने कहानियों वगैरह में पढ़ा भी यही है | फिल्म-इत्यादि में भी यही देख लिया है कि समर्पण का अर्थ होता है कि कोई व्यक्ति है या कोई विचार है, उसके सामने जा कर के नमन कर दिया और भाषा हमारी कुछ ऐसी सी फुहड़ है कि जब डकैत पुलिस के सामने हथियार रखते हैं तो उसको हम कहते हैं: आत्म-समर्पण| कि चंबल में सभी डकैतों ने पुलिस के सामने आत्म-समर्पण कर दिया, तो मन में अब वहीँ सब छवियाँ बैठी हुई हैं कि समर्पण के बाद जेल | जब तक समर्पण नहीं है, तो हाथ में बन्दूक है| समर्पण के बाद तो कुछ नहीं | इज्ज़त भी गई, हथियार भी गया, कुछ नहीं बचा !
समर्पण वैसा नहीं है| समर्पण का अर्थ बस वही समझना कि पेड़ से पत्ते का झड़ना या तुम्हारे हाथ में गरम कोयला है और तुम्हें दिख रहा है कि व्यर्थ की चीज़ है, नुक्सान दे रही है, तो तुम क्या करते हो? छोड़ देते हो| और फिर क्या परवाह करते हो कि कहाँ गया? अरे! जहाँ भी गया, जाए, मेरा पिंड छूटा|

