श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,… read_more
छायया स्पृष्टमुष्णं वा शीतं वा सुष्ठु दुःष्ठु वा । न स्पृशत्येव यत्किंचित्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥
chāyayā spṛṣṭamuṣṇaṃ vā śītaṃ vā suṣṭhu duḥṣṭhu vā na spṛśatyeva yatkiṃcitpuruṣaṃ tadvilakṣaṇam
If the shadow of a man is touched by heat or cold, good or evil, it does not in the least affect the man,… read_more
अतीताननुसन्धानं भविष्यदविचारणम् । अउदासीन्यमपि प्राप्तं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥
atītānanusandhānaṃ bhaviṣyadavicāraṇam audāsīnyamapi prāptaṃ jīvanmuktasya lakṣaṇam
Not dwelling in the past, taking no thought for future, and looking with indifference upon the present, are characteristics of the liberated-in-life.
~ Verse 432
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Questioner (Q): My mind wanders into the past… read_more
अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहितस्यैव दृढप्रबोधः । प्रबुद्धतत्त्वस्य हि बन्धमुक्तिः मुक्तात्मनो नित्यसुखानुभूतिः ॥
atyantavairāgyavataḥ samādhiḥ samāhitasyaiva dṛḍhaprabodhaḥ prabuddhatattvasya hi bandhamuktiḥ muktātmano nityasukhānubhūtiḥ
For the extremely dispassionate man alone there is samādhi, and the man of samādhi alone gets steady realization, the man who has realized the Truth is alone free from bondage,… read_more
Questioner: The entire universe, the gross and subtle objects, people, gods and goddesses, feelings, thoughts, they are all nothing but mind stuff. As I live in this world, being an entity, I am unable to see this world as non-existent; I still see differences. I am unable to wake up.… read_more
यावद्वा यत्किंचिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे । कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥
yāvadvā yatkiṃcidviṣadoṣasphūrtirasti ceddehe kathamārogyāya bhavettadvadahantāpi yogino muktyai
As long as there is even a trace of poison left in the body, how can one hope for complete recovery? Even so, the yogi cannot attain liberation as long as a trace of… read_more
एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः। सर्वात्मा सर्वरूपश्चसर्वातीतोऽहमव्ययः।।
इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीरों से भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
~ अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४०)
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) शंकराचार्य के श्लोक को उद्धृत किया है, “आत्मा स्थूल… read_more
यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।
“जहाँ अज्ञान से द्वैत-भाव होता है, वहीं कोई और दिखलाई देता है। जब सब आत्मरूप ही दिखाई देता है, तब अन्य कुछ भी नहीं रहता।”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।
“उस अवस्था में सम्पूर्ण… read_more
प्रश्नकर्ता: अपरोक्षानुभूति में बताया गया है कि मैं सब गुणों, सब क्रियाओं के पार हूँ, मैं अमर और मुक्त हूँ। तो फिर जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?
आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति कह रही है कि “जीव अमर है और मुक्त है, जीव अकर्ता है, जीव… read_more
अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।
“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)… read_more
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) मूलतः बात ये पूछी है कि “आत्मा को कहा तो निर्गुण जाता है, और निर्गुण का अर्थ हुआ कि कोई एट्रिब्यूट (गुण) नहीं, कोई उपमा-उपाधि नहीं। तो फिर आत्मा को निर्गुण के साथ ही निर्विकार, निर्मल, निराकार, अविनाशी, नित्य, शुद्ध, अजर-अमर इत्यादि क्यों कहा जाता… read_more
दोषोऽपि विहित: श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स गच्छति। इह पश्यति नानात्वं मायया वन्चितो नर:।।
“‘मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है’, ऐसा कह कर श्रुति ने दोष भी बतलाया है। मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।” ~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४८)
आचार्य प्रशांत: अड़तालीसवाँ श्लोक है अपरोक्षानुभूति का।… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ग्रंथों को पढ़कर, तत्वबोध को पढ़कर काफ़ी विभाजनों के बारे में पता चला है, जैसे कि अलग-अलग तरह के कर्म, अलग-अलग तरह के शरीर इत्यादि। ये सब विभाजन क्यों हैं? यह सब बड़ा सैद्धांतिक-सा लगता है। इतना विभाजन है कि समझ नहीं आता, कैसे इन सबको समझा… read_more
कर्माणि कतिविधानी सन्तीति चेत् आगामीसंचितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानी सन्ति। ज्ञानोत्पत्तनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति तदागामीत्यभिधीयते। संचित कर्म किम्? अनंतकोटिजन्मनां बीजभूतं सत् यत्कर्मजातं पूर्वार्जितं तिष्ठति तत्संचितं ज्ञेयं। प्रारब्ध कर्म किमिति चेत्। इदं शरीरमुत्पाद्य इह लोके एवं सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं भोगेन नष्टं भवति प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयं इति। संचितं कर्म ब्रहैवाहमिति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति। आगामि कर्म… read_more
अविद्योपाधि: सन् आत्मा जीव इत्युच्यते। मायोपाधि: सन् ईश्वर इत्युच्यते।
अविद्या उपाधि से युक्त आत्मा को जीव कहते हैं। माया उपाधि से युक्त आत्मा को ईश्वर कहते हैं।
—तत्वबोध, श्लोक २८-२९
तस्मातकारणात् न जीवेश्वरयोर्भेद बुद्धि स्वीकार्या।
इसलिए जीव-ईश्वर में भेद बुद्धि को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
—तत्वबोध, श्लोक ३१
प्रश्नकर्ता: आचार्य… read_more
स्थूलशरीराभिमानि जीवनामकं ब्रह्मप्रतिबिम्बं भवति। स एव जीव: प्रकुत्या स्वस्मात् ईश्वर भिन्नत्वेन जानाति।।
स्थूलशरीर अभिमानी जीव नामक ब्रह्म का प्रतिबिंब होता है। वह ही जीव स्वभाव से ही ईश्वर को अपने से भिन्न जानता है।
—तत्वबोध, श्लोक २७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। मैं स्वयं विभिन्न प्रकार से स्वभाव में स्थित रहने… read_more
यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मण: न शूद्र: न पुरुष:। किन्तु असंगः सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाकाशरूपोऽस्मीति दृढनिश्चयरूपः अपरोक्षज्ञानवान् जीवन्मुक्तः॥
जिस तरह हम देह हैं, हम पुरुष हैं, हम ब्राह्मण हैं, हम शूद्र हैं, इस प्रकार का दृढ़ निश्चय होता है, वैसा ही दृढ़ निश्चय हम ब्राह्मण नहीं हैं,… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शिव और शंकर दोनों एक हैं, या अलग-अलग हैं?
आचार्य प्रशांत: जब उनको मूर्त कर दें तो कह दीजिए शंकर, जब अमूर्त हों तो कह दीजिए शिव। जब असीम हैं तो शिव हैं, जब साकार कर दिया, ससीम कर दिया तो कह दीजिए शंकर। कुछ भी जो… read_more
ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति, पूजामूलं गुरुर्पदम्। मन्त्रमूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरूर्कृपा॥
ध्यान का मूल, गुरु की मूर्ति है। पूजा का मूल, गुरु के चरण कमल हैं। मंत्र का मूल, गुरु के शब्द हैं। मोक्ष का मूल, गुरु की कृपा है।
—(गुरुगीता, श्लोक ७६)
प्रश्नकर्ता: गुरुकृपा क्या होती है?
आचार्य प्रशांत: अगर तुम सच-सच… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरे जीवन में समझदारी कभी रही ही नहीं, सारा जीवन ही बेवकूफियों में चला गया, सब बेहोशी में बीता। कृपया मार्ग सुझाएँ।
आचार्य प्रशांत: बस मार्ग यही है – जैसे हैं इस प्रश्न को लिखते वक़्त, वैसे ही रहिए। विनम्रता तो इतनी बड़ी बात है कि… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे पहले दुनियादारी बोझ लगती थी, अब सत्य को जानना, अध्यात्म में उतरना भी एक दायित्व लगता है, वासना ही लगती है। हर वक़्त बोझिल रहता हूँ, सहज नहीं हूँ; चाहता हूँ कि सत्य अभी मिल जाए। कृपया मदद करें।
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं, विचार… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पूरी दुनिया में सब भाग रहे हैं, पर आपने तो अपने करिअर का चुनाव कर लिया और रुक गए। हम कैसे समझें कि हमें कहाँ रुकना है?
आचार्य प्रशांत: तो कुछ लोग भाग-भागकर करिअर बनाते हैं, मैं शायद रुक-रुककर बना रहा होऊँगा! इतना तो तुमने पक्का ही… read_more
प्रश्नकर्ता: क्या अहंकार भी सात्विक, राजसिक, तामसिक होता है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: होता है। अहम् के साथ भी तुम इन तीनों गुणों को जोड़कर देख सकते हो। प्रकृति के गुण हैं, अहम् पर ही लागू होते हैं।
तामसिक अहंकार क्या है?
जिसने धारणा बना ली है कि, "मैं… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया मन और बुद्धि के सम्बन्ध पर प्रकाश डालने की कृपा करें। क्या बुद्धि मन को सही विकल्प चुनने हेतु दी गई है?
आचार्य प्रशांत: मन है अहम् की गति। अहम् एक तड़प है, वो शांत नहीं बैठ सकती। उसे नाचना है, और उसका ये नृत्य कोई… read_more
प्रश्नकर्ता: तत्वबोध के अनुसार आकाश, जल, वायु और अग्नि आदि तत्वों से कान, नाक, जीभ, त्वचा और आँख आदि इंद्रियों की उत्पत्ति हुई, लेकिन पाँच तत्व तो अचेतन हैं, उनसे इंद्रियों की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: यहाँ उत्पत्ति विषयों की और इंद्रियों की क्रमशः नहीं… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु शंकराचार्य जी ने आत्मा को इस तरह परिभाषित किया है – "स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से जो पृथक है, जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है तथा जो सच्चिदानंदस्वरूप है, वह आत्मा है”, और वहीं यह भी कहा है कि "स्थूल शरीर अभिमानी आत्मा को… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा आपने अपने सत्रों में आध्यात्मिक मनोरंजन का ज़िक्र किया है व निंदा की है, तो मैं जानना चाहती हूँ कि कथा और सत्संग इत्यादि में जो सामूहिक भजन-कीर्तन और नाम जपा जाता है, वह क्या माना जाएगा?
आचार्य प्रशांत: कुछ मानने की ज़रूरत नहीं है, जाँच… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। तत्व विवेक की परिभाषा में कहा गया है कि, "आत्मा सत्य है, उससे भिन्न सब मिथ्या है, ऐसा दृढ़विश्वास ही तत्व विवेक है।"
मेरा सवाल यह है कि सिर्फ़ आत्मा को ही सत्य समझना क्या साधना की एक उच्च अवस्था पर पहुँचने के बाद ही हो… read_more
स्थूलशरीरं किम्? पंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगायतरन शरीरं अस्ति जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति षड्विकारवदेतत्स्थूलशरीरं।
सूक्ष्मशरीरं किम्? अपंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगसाधनं पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि पञ्चप्राणादयः मनश्वैचकं बुद्धिश्वैचकं एवं सप्तदशाकलाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मशरीरं।
स्थूल शरीर क्या है? जो पंचीकृत पाँच महाभूतों से बना हुआ, पुण्य कर्म से प्राप्त, सुख-दु:खादि भोगों को भोगने का… read_more
सत्किम्? कालत्रयेअपि तिष्ठतीतिसत्। चित्किम्? ज्ञानस्वरूपः। आनंद कः? सुखस्वरूपः।
सत् किसे कहते हैं? जो तीनों कालों में रहता है। चित् क्या है? जो ज्ञानस्वरूप है। आनंद क्या है? जो सुखस्वरूप है।
—तत्वबोध, श्लोक १६.२-१६.४
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्, चित् और आनंद के बारे में आदि शंकराचार्य बता रहे हैं। कृपया इसे… read_more
प्रश्नकर्ता: अपने आध्यात्मिक जीवन में नित्यता कैसे लाएँ?
आचार्य प्रशांत: नित्यता तो कसौटी है। नित्यता कसौटी है जिस पर तुम अनित्य को वर्जित करते हो, अनित्य को गंभीरता से लेने से इन्कार करते हो। जब भी कुछ लगे कि मन पर हावी हो रहा है, तो कसौटी का प्रयोग करना… read_more
शमः कः? मनो निग्रहः।
शम क्या है? मन के ऊपर नियंत्रण प्राप्त करना ही शम है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.३
आचार्य प्रशांत: दमन जो काम स्थूल रूप से करता है, शमन वही काम सूक्ष्म रूप से करता है। दमन का मतलब है यह हाथ लड्डू की ओर बढ़ना चाहता है, यह… read_more
प्रश्नकर्ता: तितिक्षा क्या है?
आचार्य प्रशांत: तितिक्षा है कि साधक इधर-उधर के संवेगों के प्रति उदासीन हो जाता है। उसको एक चीज़ चाहिए, बाकी सबके प्रति वह अनासक्त हो जाता है, अक्रिय हो जाता है, जैसे बहुत सारी चीज़ें उसके लिए अदृश्य हो गई हों। बहुत कुछ हो जो दिखाई… read_more
उपरमः कः? स्वधर्मानुष्ठानमेव।
उपरम क्या है? स्वधर्म का अनुष्ठान ही उपरम है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.५
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म क्या है और स्वधर्म का जीव के पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों से क्या लेना-देना है — इसको बहुत ध्यान से समझेंगे सभी, क्योंकि इस विषय पर भ्रम बहुत हैं और यहीं पर… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। बोध का अर्थ शायद अनुभूतिपूर्ण अपरोक्ष ज्ञान है। जगद्गुरू आदिशंकराचार्य ने इसके लिए जो आवश्यक साधन-चतुष्टय बताए हैं, उनको उपलब्ध किए बिना इस ज्ञान का सिर्फ़ श्रवण या पठन क्या एक दुविधा अथवा एक प्रकार का मानसिक अनुकूलन नहीं पैदा करेगा? यह दुविधा या मानसिक अनुकूलन… read_more
श्रद्धा कीदृशी? गुरुवेदांत वाक्यादिषु विश्वासः श्रद्धा।
श्रद्धा कैसी होती है? गुरु और वेदान्त के वाक्यों में विश्वास रखना श्रद्धा है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपरोक्त वक्तव्यों से यह साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि क्यों गुरु के जीवन को हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। गुरु के… read_more
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। संसार में इतना कुछ है प्राप्त करने और सीखने के लिए—धन-दौलत, नाम-यश, इंद्रियभोग, सुख—बहुत कुछ है, पर इन सबके बावजूद, इन सबसे परे और श्रेष्ठ परम शांति और मुक्ति प्राप्त करना भी चाहें, तब भी मन इन्हीं सांसारिक वस्तुओं के पीछे भागता है। मगर जो व्यक्ति… read_more
दमः कः? चक्षुरादि बाह्योइंद्रिय निग्रहः।
दम क्या है? चक्षु आदि बाह्य इंद्रियों का निग्रह करना ही दम है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.४
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप भी अकसर नियंत्रण और दमन की बात करते हैं, तो तत्वबोध में दम की जो परिभाषा दी गई है, वह उससे क्या भिन्न है?
आचार्य… read_more
प्रश्नकर्ता: मैं अध्यात्म में आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा हूँ?
आचार्य प्रशांत: ‘हाँ’ (रज़ामंदी) नहीं है। सामर्थ्य भी हो, विवेक भी हो, ऊर्जा भी हो, सब व्यर्थ है अगर हामी नहीं है। ये जो पूरा खेल ही चल रहा है न आध्यात्मिक, रूहानी, ये है ही महबूबा की हामी… read_more
यदृष्टाव नापरं दृश्यम् यदभूत्वा न पुनर्भव:। यज्ज्ञात्वा नापरं ज्ञेयं तदब्रह्मेत्यवधारयेत्।।
जिसके दर्शन के पश्चात् और कुछ देखने को नहीं बचता, जिसके प्राप्ति के बाद फिर संसार में जन्म नहीं होता और जिसको जानने के बाद और कुछ भी जानने को नहीं रहता, उसे ही ब्रह्म जानो।
—आत्मबोध, श्लोक ५५
प्रश्नकर्ता:… read_more
उपाधिविलयाद्विष्णो निर्विशेषं विशेन्मुनि:। जले जलं वियद्वव्योम्नि तेजस्तेजसि वा यथा।।
उपाधियों के नष्ट हो जाने पर मुनि सर्वव्यापक सत्ता अर्थात् विष्णु में, जल में जल, आकाश में आकाश और तेज में तेज की भाँति विलीन हो जाता है।
—आत्मबोध, श्लोक ५३
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, डाइनैमिक मेडिटेशन नियमित हो रहा था, जो… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। तत्वबोध एवं आत्मबोध में शंकराचार्य जी द्वारा ब्रह्म को निराकार, गुणातीत आदि बताया गया है, परंतु उनके द्वारा स्थापित आश्रमों को शक्तिपीठ कहा जाता है तथा उनके द्वारा शिव, विष्णु आदि पर भी श्लोकों की रचना की गई है। कृपया उपरोक्त संबंध में मार्गदर्शन की कृपा… read_more
प्रश्नकर्ता: क्या हम ग्रंथों का दुरुपयोग करते हैं?
आचार्य प्रशांत: ग्रन्थ ना पढ़ना बेहतर है ग्रन्थ का दुरुपयोग करने से। ये तो अहंकार ने बड़ा ही अनर्थ कर दिया, पहले तो वो ग्रन्थ को छूता नहीं था, और अब क्या कर रहा है? छू करके उसका इस्तेमाल कर रहा है… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आपसे प्रश्न पूछा गया था कि मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है, तो आपने कहा था कि मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हम स्वयं ही हैं क्योंकि हमने ही बंधनों का चुनाव कर रखा है। मगर, आचार्य जी, इन बंधनों के… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी सत्य के मार्ग पर चलना शुरू ही किया है और समस्याएँ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही हैं।
आचार्य प्रशांत: तो ठीक है, आगे तो बढ़ो थोड़ा। अभी तो बड़े मज़े में बखान कर रहे हो कि समस्याएँ आ रही हैं। थोड़ा पिटो। अभी तो फ़ैशन जैसा लग… read_more
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, साधना का क्या मतलब है? क्या आँख बंद करके ध्यान लगाना साधना है?
आचार्य प्रशांत: जो आपकी ज़मीनी मुसीबतें हैं, जो आपकी वास्तविक बेड़ियाँ हैं, उनको काटने का नाम साधना है। आपकी साधना यही थी कि आपने शराब से मुक्ति पायी, वो साधना हुई। अब वो साधना… read_more
प्रश्नकर्ता: नमन, आचार्य जी। जीवन में अजीब-सा अधूरापन रहता है, लगता है कि कुछ कमी है। लेकिन जीवन की भागा-दौड़ी और परिवार में इतना उलझे हुए हैं कि समय ही नहीं मिल पा रहा ईश्वर की आराधना के लिए। इस तरह निरंतर जीवन खर्च होता जा रहा है। समाधान क्या… read_more
स्थाणौ पुरुषवद्भ्रान्त्या कृता ब्रह्मणि जीवता। जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्टे निवर्तते॥
अज्ञान के कारण जैसे खम्भे में भूत दिखने लगता है, वैसे ही ब्रह्म जीव प्रतीत होने लगता है। जीव का तात्विक रूप जान लेने पर उसका जीवभाव समाप्त हो जाता है।
—आत्मबोध, श्लोक ४५
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। परमात्मा क्या… read_more
एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते। उदितावगतिर्ज्वाला सर्वाज्ञानेन्धनं दहेत्॥
जब आत्मा के निम्न और उच्च पहलुओं (आत्म-अनात्म) का मंथन किया जाता है, तो उससे ज्ञानाग्नि उत्पन्न होती है। जिसकी प्रचण्ड ज्वालाएँ हमारे भीतर के अज्ञान-ईंधन को जलाकर राख कर देती हैं।
—आत्मबोध, श्लोक ४२
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ये अग्नि कैसे जले… read_more
प्रकाशोऽर्कस्य तोयस्य शैत्यमग्नेर्यथोष्णता। स्वभावः सच्चिदानन्दनित्यनिर्मलताऽऽत्मनः॥
जैसे सूर्य का स्वभाव प्रकाश, जल का शीतलता और अग्नि का उष्णता है, इसी तरह से आत्मा का स्वभाव सच्चिदानंद, नित्यता और निर्मलता है।
—आत्मबोध, श्लोक २४
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा नमन स्वीकार करें। आत्मबोध के श्लोक संख्या २४ में लिखा है कि आत्मा… read_more