क्रांति है अपना साक्षात्कार, महाक्रांति अपना सहज स्वीकार || आचार्य प्रशांत (2015)

श्रोता: सर, अभी दिमाग में ये चल रहा था कि ये बोलूँगी, ये बोलूँगी, ये बोलूँगी, ये बोलूँगी और फिर क्या हो जाता है पता नहीं? ये हो जाता है कि दबा लो, अन्दर रख लो?
वक्ता: देखो! तुम्हारे भीतर जो भी है, उसके साथ आत्मा भी तो है न? वो कोई बाहर से तो देता नहीं किसी को, वो वही है। आप जितनी भी चालाकियाँ कर लें, आपको, जो आप वास्तव में हैं, उसे ही आत्मा कहते हैं। ‘आत्म’ माने मैं। आपको पता होता है कि, ‘’मैं क्या कर रहा हूँ,’’ आपको पता होता है कि आपके सारे सवाल फ़िज़ूल हैं। भले ही आप बहुत ज़ोर से चिल्ला रहे हों कि मेरे पास ये-ये शक़ है, या संदेह है, पर आपको पता तो होता ही है कि फ़िज़ूल है। हर सवाल मूलतः झूठ है ये आप जानते हैं।
सच्चा कोई सवाल नहीं होता। हर सवाल में अगर गौर से देखा जाए तो कहाँ पर झूठ बैठा है, ये आपको दिख जाएगा। मूल झूठ तो हर सवाल का यही होता है कि, ‘’मैं जानता नहीं।’’
आप सवाल पूछोगे क्यों अगर आप कहोगे कि, ‘’मैं जानता हूँ।’’ सवाल के पीछे ये भावना तो होती ही है न कि, ‘’मैं?’’
श्रोता: नहीं जानता।
वक्ता: नहीं जानता। मूल झूठ तो ये है ही और और भी छोटे-मोटे झूठ हैं। और इसीलिए तुम वो सवाल ले कर के एक सात्विक वातावरण में नहीं जा पाते हो। ठीक वैसे जैसे किसी मौन जगह पर शोर मचाना तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा। या किसी मंदिर में गंदे होकर जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा। ठीक उसी तरीके से सत्य के सामने अपने झूठ ले कर के जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगता है। तुम्हारा खुद ही फिर मन ये नहीं करता कि इन बातों को यहाँ रखो। कोई तुक नहीं बनता है। क्या पूछें? ये कोई बातें हैं पूछने की? ये कोई पूछने की बात है? तुम्हारे सारे सवाल ऐसे हैं, जैसे किसी की पीठ में खुजली हो रही हो। अब माहौल है ऊँचे से ऊँचे सत्य का, परम का और तुम वहाँ पर क्या पूछो?

