वक्ता: मीरा कहती हैं:
दास भक्त की दासी मीरा
रसना कृष्ण रटे
उसके साथ सूर कहते हैं:
सोइ रसना
जो हरि गुण गावै
सवाल किया है कि रसना यानि ज़बान, जिह्वा की सार्थकता ईश्वर के गुण गाने में बताई गयी है। आशय क्या है हरि गुण से? और फिर जो यह जीभ दिन-भर की, इधर-उधर की हजारों बातें करती है, क्या वो सब निर्थक हैं?
शाब्दिक अर्थ बहुत महत्त्व का नहीं होता, जब हम संतों की दुनिया में होते हैं। रसना को मीरा के और सूर के संबंध में सीधे जिह्वा कह देना उचित नहीं होगा। उसका गहरा और व्यापक अर्थ लेना होगा।
वो सब कुछ जहाँ से रस की प्रतीति होती है, वो रसना है। उसके केंद्र में जो शब्द है उस पर गौर करिए: ‘रस’। आपके भीतर का वो उपकरण, जो रस को चखे और रस को चखने में अपने अनुभव को रस का नाम दे उसे रसना मानिये, मात्र ज़बान ही ही नहीं।


