इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। अभी जीवात्मा के बारे में बात हुई जिसे हम 'आयाम' भी कह सकते हैं। तो सर, इसी के संदर्भ में तीन तरह के कर्म भी आते हैं भारतीय दर्शन में, अद्वैत में, संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म। इन कर्मों का किस तरह से जीवात्मा से संबंध है?
आचार्य प्रशांत: ये सारे कर्म अहंकार के लिए ही होते हैं, सारे कर्म। जो अहम् नहीं रहा, उस पर किसी संचित कर्म या प्रारब्ध कर्म इत्यादि का कोई प्रभाव नहीं रहता। वास्तव में कर्मों से मुक्ति का तरीका भी बस एक ही है, कि आप वो रहो ही नहीं जिसके लिए वो सब कर्म हैं। जब तक अहंकार रहेगा, तब तक उसे भोक्ता भी होना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि वो कर्ता बना बैठा था। जो कर्ता बना है, उसे अपने कर्म का भोक्ता भी होना पड़ेगा। तो तुम कह सकते हो, "हाँ, पीछे का कर्म है, संचित इत्यादि, करा था अब उसको भुगतना भी पड़ेगा।" क्यों? क्योंकि तुम वही हो जिसने करा था। तो तुम भुगतोगे भी।
तो न भुगतने का तरीका भी एक ही होता है, तुम वो रह ही न जाओ जिसने करा था। अहंकार यदि है, तो जितने वो कर्म करे बैठा है वो उन सबका भोक्ता भी अनिवार्यतः बनेगा। जिसने कुछ करा, करने के बाद मर ही गया, तो अब सजा किसको मिलेगी? किसको मिलेगी?
श्रोता: किसी को नहीं।



