आचार्य प्रशांत: ज्ञान बिना भक्ति असंभव है। जो ये सोचे कि ज्ञान नहीं होगा, समझेंगे नहीं, बोध नहीं होगा पर भक्त बन जाएँगे, वो आत्मप्रवंचना में है, *सेल्फ-डिसेप्शन*। उसकी भक्ति फिर ऐसी ही होगी, कैसी वाली? (आँखें बंद करके भजन करने का अभिनय करते हुए) ये वाली भक्ति होगी।
असली भक्ति वो है जो बोध के बिलकुल साथ-साथ चलती है। इसीलिए मैंने कहा, असली भक्त वो है जिसे लाओ-त्सु भी सुहाए, जिसे अष्टावक्र से कोई विरोध ना हो। और पूरी अष्टावक्र गीता में मुझे ताज्जुब होगा अगर प्रेम शब्द कहीं भी आया हो। आया है क्या? कहीं नहीं। पूरी अष्टवक्र गीता में शायद ही भक्ति और श्रध्दा की बात होगी, है क्या?
प्रश्नकर्ता: एक श्लोक में श्रद्धा है, एक या दो में।
आचार्य: बस। पर असली भक्त वो है जिसे ज्ञान से कोई गुरेज़ नहीं। उसकी भक्ति ज्ञान को अपने में समेटे हुए है। और यदि तुम्हारी भक्ति ऐसी है जो मूढ़ता की भक्ति है, तो फिर उसमें कुछ नहीं रखा है। उसको ये कह रहे हैं कि वो एक गन्दा रिश्ता है। ये तो छोड़ ही दो वो परम रिश्ता है, फिर तुम्हारी भक्ति एक गन्दा रिश्ता है, इलिसिट लव है।
प्र: सर, जब आपने बोला था भक्ति ज्ञान की माँ है, तो ये वही मुर्गी और अंडे वाली समस्या हो गई।
आचार्य: कोई समस्या नहीं है, आप कहीं से भी आगे बढ़ लो। आपको जानना क्यों है? आप अपनी बात करो। आप कहीं से तो शुरुआत करो न। भक्ति सूत्र इसी में आगे कहते हैं कि व्यर्थ की बात करने में भक्त का मन नहीं लगता है। पढ़ा? आएँगे अभी उसमें। और छोटा सा सूत्र है, वो बस इतना ही कह रहा है कि भक्त वही जो फालतू वाद में पड़े ही न।

