मूर्तिपूजा और विधियों का महत्व; भक्ति व ज्ञान में अंतर || आचार्य प्रशांत (2014)

प्रश्नकर्ता: मुझेमूर्ति, ध्यान – इनमें आस्था है, क्या यह मुझे ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करेगा?
आचार्य प्रशांत: जब तक तुम अपने आप को देह समझते हो, जब तक अहम् , रूप से जुड़ा हुआ है,अभिज्ञात है, तब तक परम भी तुमको मूर्त रूप में ही दिखाई देगा। निराकार की उपासना उन्हीं के लिए उचित है, जो इस स्थिति पर पहुँच गए हैं कि वो अपने आप को निराकार समझने लगें। तुम अपने आप को तो देह समझते हो। दुनिया में तुम्हें रूप, रंग, देह, आकार, दृश्य, इनके अलावा कुछ दिखाई नहीं देता तो तुम परम की उपासना करोगे कैसे? क्योंकि तुमने तो सिर्फ रूप, रंग, आकार, दृश्य, ही जाना है। हाँ, जब मन थोड़ा और, और समीप आये स्रोत के, तब तुम्हें ये हक़ मिलता है कि अब तुम निराकार, निर्गुण, को पूजो। उससे पहले तो मजबूरी है, मूर्तिपूजा करनी ही पड़ेगी। और मूर्ति की पूजा भी इसीलिए कि जाति है ताकि एक दिन मूर्ति से आगे बढ़ के अमूर्त को देख सको।
वेद कहते हैं कि उसकी कोई प्रतिमा नहीं हो सकती। तो ये मत समझना कि मूर्तिपूजा किसी धर्म में विशेष रूप से अनुकरणीय है। ऐसा कुछ नहीं है। वेदांत का जिसने क, ख, ग, भी पढ़ा है, वो अच्छे से जानता है कि वहाँ मूर्ति जैसी कोई चीज़ नहीं होती – इस्लाम में नहीं होती, सिक्खों में नहीं होती, वेदांत में भी नहीं होती। लेकिन जब हम ये कहते हैं, तो हमें इसके साथ साथ मन के तथ्य को भूलना नहीं चाहिए। जब मुझे इन्द्रियों के तल पर ही जीना है, जब अभी मैं इन्द्रियों से उठने की स्थिति में ही नहीं हूँ, तो फिर मुझे इन्द्रियों से ही रास्ता बनाना पड़ेगा।
संसार में रूप, रंग, ध्वनि, इन्द्रियगत जितना कुछ हो सकता है, मुझे तो वही वही आकर्षित करता है, वही वही दिखाई देता है। तो फिर मुझे उसी से गुज़र कर के आगे बढ़ना पड़ेगा। इस कारण मूर्तिपूजा की विधि बनाई गयी। वो एक तरीका है, एक औज़ार है। अंत नहीं है, याद रखना अंत तो वही है कि तुम निर्गुण में पैठ जाओ। शून्य में समा जाओ। मूर्ति पूजा तो सिर्फ एक ज़रिया बनाया गया है कि एक दिन तुम इस मूर्ति के आगे भी निकल जाओगे ।
