प्रश्नकर्ता: सर, जैसे आपने अभी कहा कि परमात्मा सिर्फ़ एक होता है। लेकिन हमने अपनी ओर से देखा नहीं या जाना नहीं और जो भी पता है हमें, वो दूसरों के द्वारा ही पता चला है। तो हमें जब उसके बारे में कुछ पता ही नहीं, तो उससे प्रेम कैसे होगा?
आचार्य प्रशांत: तो इससे अच्छा है नहीं करो प्रेम, वास्तव में।
वास्तव में जब तुम्हारी परमात्मा की सारी छवियाँ दूसरों से ही आई हैं, तो पहला काम तो यह है कि उन छवियों से यारी छोड़ो। तुम्हें क्या पता है कृष्ण का? पर तुमने सुन लिया है कि कृष्ण-कन्हैया, मुरली-बजिया। तो जन्माष्टमी आती है तो तुम भी कूदना शुरू कर देते हो। सबसे पहले तो यह कूद-फाँद छोड़ो।
ईमानदारी की बात यह है कि तुम्हें कृष्ण से कुछ लेना-देना है नहीं। पर तुम्हें एक नौटंकी करनी होती है, हर साल दो बार। वो तुम कर लेते हो।
तुम्हें कुछ पता है कृष्ण का? तुम्हारा दिल ज़रा भी है कृष्ण में? तुम्हारे मन में गीता गूँजती है?
कुछ भी ऐसा नहीं है न? तो फिर क्यों स्वांग करते हो कि खीर चटाएँगे और वो लड्डू-गोपाल। क्यों यह सब झूठ बोलते हो? क्यों धोखा देते हो? तो पहला काम तो यह करो कि “जब मैं जानता ही नहीं कृष्ण को, तो मैं झूठ तो नहीं बोलूँगा।”
इस सारे नकली से पहले मुक्त हो जाओ। यह जो पूरा तुमने नकली खेल चला रखा है परमात्मा का, इससे मुक्त हो जाओ। नकली आस्तिक होने से कहीं बेहतर है कि तुम सच्चे नास्तिक हो जाओ और उसके बाद फिर तुम्हें अपने-आप कुछ पता लगना शुरू होता है, वही सच्ची आस्तिकता होती है। तब कृष्ण आते हैं। उस रूप में नहीं आते, जिस रूप में तुमने कहानियाँ बना रखी हैं; कि मोर मुकुट लगाकर, गाय लेकर और गोपियाँ लेकर और नृत्य करते हुए आएँगे, न। वो सब तो छवियाँ हैं। उन छवियों को जाना होगा। जब वो छवियाँ सब चली जाती हैं और तुम ईमानदारी से बिलकुल खाली हो जाते हो, तब वास्तविक रूप में परमात्मा उतरता है।

