प्रश्न: सर, इस लेख में लिखा है, ‘भक्ति ज्ञान की माता है’। इसका क्या अर्थ है?
वक्ता: यहाँ पर ज्ञान से इनका मतलब है, ‘अंतिम अनुभूति’, और वो भक्ति के बिना नहीं हो सकता।
श्रोता १: क्या भक्ति, मुक्ति से भिन्न नहीं है?
वक्ता: आप जो पकड़ कर बैठे हो, उसको ही आप भक्ति में छोड़ते हो। जो आपने पकड़ रखा था, भक्ति में उससे ही मुक्ति मिल जाती है। वो इसलिए कह रहे हैं कि- भक्ति, मुक्ति से अलग नहीं है- क्योंकि आमतौर जो ‘मुक्ति’ शब्द है, वो ज्ञान के सन्दर्भ में प्रयोग होता है। जब भी कोई मुक्ति की बात करता है, तो ऐसा लगता है कि ज्ञानी आदमी है, समझ गया है, मुक्त हो गया है।
लेकिन जैसे कबीर कहते हैं कि मुक्ति चाहिए ही नहीं, “प्रेम दर्शन पाय के, मुक्ति कहा को रोये”। अब मैं मुक्ति को रोता ही नहीं हूँ। मुक्ति किसको चाहिए?
ज्ञान में तुम कहते हो कि मुझे ‘इससे’ मुक्त होना है। ज्ञान में तुम्हारी जो स्थिति है वो यह है कि ‘ये’ मुझे पकड़ कर बैठा है और मुझे ‘इससे’ मुक्त हो जाना है। ज्ञान में तुम यह कह रहे हो कि दुनिया मुझे व्यथित किये जा रही है, और मुझे मुक्ति चाहिए। ज्ञान में तुम कह रहे हो कि तुम्हें बंधक बनाया जा रहा है, इसलिए तुम्हें मुक्ति चाहिए। ठीक है? तो दोष किसका है?
सभी श्रोतागण(एक स्वर में):

