आचार्य प्रशांत: श्रद्धा क्या है? कभी-कभी आप लोग बोलते हो ना, और जब बोलते हो तो थोड़ी थकान हो जाती है, तो अचानक से मन कहता है, “चुप हो जाओ, इतनी बातें तो हैं ही उन्हीं को सुन लेंगे तो उत्तर मिल जाएगा।” अभी थोड़ी देर के लिये चुप हुआ और मन ने कहा कि ये जो बह रहा है और जिसकी आवाज़ लगातार आ ही रही है, इसी को आप ध्यान से सुन लें तो क्या पता नहीं लग जाएगा श्रद्धा क्या है?
ऐसा होगा नहीं (सभी हँसते हैं) पर थकान के कारण मन ने ये बात कही। श्रद्धा क्या है? साफ़ साफ़ न जानना फिर भी मन का न परेशान होना न डिगना, ये श्रद्धा है। ऐसे समझिये, आप किसी के विषय में सारी जानकारी इकठ्ठा कर लो, और फिर आपको यकीन आये कि ठीक है सब कुछ। आप किसी के बारे में सारी जानकारी इकठ्ठा कर लो – माँ बाप, काम धंधा, धर्म, जात, गोत्र, भाई-बहन-खानदान, रुपया-पैसा, आर्थिक स्थिति, पूरा इतिहास, और फिर आपको यकीन आये कि ठीक है सब कुछ, इसका नाम होता है विश्वास।
और आप किसी से मिलो, उसकी आँखों में देखो, और आपको उसका नाम भी नहीं पता है, और अचानक एक अकारण विश्वास आ जाए कि ठीक है सब कुछ, इसका नाम है श्रद्धा। “कुछ हम जानते नहीं तुम्हारे बारे में, पर फिर भी बड़ा यकीन है तुम पर। हम तुम्हारा नाम भी नहीं जानते, कोई कारण नहीं है तुम पर यकीन करने का, पर फिर भी दिल यकीन किये जाता है,” ये श्रद्धा है।
जब कारण हो यकीन करने का, तो विश्वास है, जब अकारण मन खिंचा चला जाए तो श्रद्धा है।
“तुम्हें जानते नहीं, तुम्हें देखा नहीं, पर फिर भी, बिलकुल पता है कि तुम हो,” ये श्रद्धा है।” कोई प्रमाण नहीं तुम्हारे होने का, लेकिन फिर भी जानते हैं, अच्छे से जानते हैं कि तुम हो,” ये श्रद्धा है। और दुनिया लाख कहेगी, दुनिया सौ प्रमाण भी लाकर के दे देगी, तब भी हमें पता रहेगा कि तुम हो। वो प्रमाण गलत नहीं होंगे, “दुनिया ने प्रमाण ला कर के दिया कि तुमने चोरियाँ की, दुनिया ने प्रमाण ला कर के दिया कि तुमने अपना नाम भी हमें गलत बताया, पर फिर भी मन कह रहा है सब ठीक है,” ये श्रद्धा है।

