प्रश्नकर्ता: सर, इतनी जल्दी समर्पण क्यों कर देता हूँ? इतना कमज़ोर क्यों हूँ?
आचार्य प्रशांत: समर्पण करने में और घुटने टेकने में ज़मीन-आसमान का अंतर है!
घुटने टेकने का नाम नहीं है समर्पण, हारने का नाम नहीं है समर्पण, कमज़ोर हो जाने का नाम नहीं है समर्पण; समर्पण का अर्थ है, "मैंने अपनी कमज़ोरी को समर्पित किया; अब मैं मात्र बल हूँ", समर्पण का अर्थ होता है ‘असीम ताक़त’।
समर्पण का अर्थ ये नहीं होता कि, "मैं छोटा हूँ, नालायक हूँ, बेवकूफ़ हूँ", समर्पण का अर्थ होता है कि, "मेरे भीतर जो नालायकी थी, मेरे भीतर जो क्षुद्रता थी, मैं जो पूरा-का-पूरा ही कमज़ोरियों का पिंड था; मैंने इसको छोड़ा, मैंने इसे समर्पित किया" - यह होता है समर्पण।
समर्पण का ये अर्थ मत समझ लेना कि कहीं जा कर के अपने-आप को प्रस्तुत कर देने का नाम समर्पण है, परिस्थितियों की चुनौती का जवाब ना दे पाने का नाम समर्पण है, जीवन से हारे-हारे रहने का नाम समर्पण है; ये सब समर्पण नहीं! ये तो कमज़ोरियाँ हैं, बेवकूफ़ियाँ हैं।
मैं दोहरा रहा हूँ, समर्पण का अर्थ समझो, सभी ध्यान से समझें इसे, समर्पण का अर्थ है, वो सब कुछ जो सड़ा-गला, व्यर्थ, महत्वहीन, कचरा था उसे मैं विसर्जित कर आया, ये समर्पण है।
और तुम पूछ रहे हो, “सर, इतनी जल्दी समर्पण क्यों कर देता हूँ? इतना कमज़ोर क्यों हूँ?”

