
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पिछले एक महीने से मैं अष्टावक्र गीता पढ़ रहा हूँ। तो मैंने अपने जीवन में भी देखा, शांति के रास्ते में शरीर और मन बीच-बीच में बाधा बनते हैं। तो इसी विषय पर जब मैंने अष्टावक्र गीता देखा; उसमें दो श्लोक मिले जो इससे रिलेवेंट थे,…

प्रश्न: आचार्य जी, आप कहते हैं कि शांत रहो, मौज में रहो। जब मैं देखता हूँ कि आसपास ग़लत हो रहा है और मुझे सही करने के लिए लड़ना भी पड़ेगा, तो वहाँ क्या मुझे लड़ाई लड़नी चाहिए, या सबकुछ परिस्थितियों के हाल पर छोड़ देना चाहिए?
आचार्य प्रशांत जी:…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ एक ध्यानस्थ आदमी ही प्रेम जान सकता है। वही स्रोत है, वहाँ से ही सब कुछ निकलता है। ये जो लाल खड़े मैदान हैं न, मैदान में बड़ी लड़ाईयाँ होती हैं। लड़ाई में वही खड़ा रह सकता है, जो अंदर से शांत हो।
बाहर की गहरी अशांति…

आचार्य प्रशांत: उत्सव (सेलीब्रेशन) का मतलब ही होता है कि भीतर का ग़ुबार हट जाए, साफ़ हो जाए। शरीर की मैल नहाते वक़्त ही तो पता चलती है ना? ऐसे पता चलती है? जब नहाने जाते हो तभी पता चलता है ना, अच्छा, कुछ है। उत्सव अपने…

आचार्य प्रशांत: कुछ अनजाना-अनजाना सा, कुछ नया-नया सा लग रहा है?
शान्ति और सुविधा में ये अंतर होता है।
शान्ति के साथ जैसे चुनौती जुड़ी होती है। सुविधा के साथ सब कुछ ज्ञात होता है। शान्ति नयी होती है बहुत, जैसे ये शाम नयी है। शामें बहुत आती हैं, जैसी…

वक्ता: जो कुछ भी ज़िंदगी में कीमती है, इज्ज़त के लायक है, उसको अगर तुम कीमत देते हो, आदर देते हो तो उसका तुम कोई बहुत भला नहीं कर देते, उसका कोई हित नहीं हो जाता| क्योंकि वो ऊँचा है तभी तो कीमती है और जो पहले से ही ऊँचा…

आचार्य प्रशांत: आँखें जो होती हैं शरीर में, ये बड़ी आक्रामक होती हैं। ये भेदती हैं; टांग किधर को बढ़े उससे पहले आँख वहाँ जासूसी करके आई होती है। देखते हो न, आँख जिधर देखती है, कदम उधर को बढ़ते हैं?
आँख का काम ही है आक्रमण करना, सेंध लगाना…

वक्ता: सवाल यह है कि अपने आप को एकांत में वियुक्त कैसे रखें कि हम शान्ति और खामोशी महसूस कर सकें?
अधिकांश समय जब हम अकेले होते हैं तो हम वास्तव में अकेले नहीं होते। मन तो हमेशा किसी के संग में ही रहता है, मन को तो कोई दूसरा…

आजा का घर अमर है, बेटा के सिर भार।तीन लोक नाती ठगे, पंडित करो विचार।।~ संत कबीर
वक्ता: आजा से आशय है—मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो ही कबीर का बिंदु भी है। बेटा मतलब? जिसकी उत्पत्ति उस मूल होती हो। बेटा है…

प्रश्न: सर, अंतर्मुखी और शांत – दो शब्द होते हैं। इन दोनों शब्दों में क्या अंतर है और क्या समानता है?
वक्ता: अंतर्मुखी होने में और शांत होने में क्या सम्बन्ध है। बेटा, अंतर्मुखी, बहिर्मुखी – ये कुछ नहीं होता। ये हमने बस यूँ ही एक विभाजन बना दिया है।…

प्रश्न: हमारा मन शांत कैसे होगा?
वक्ता: अशांति कहाँ से पाई? पूछ रहे हो कि “हमारा मन शांत कैसे होगा?” ये बताओ कि अशांति कहाँ से पाई?
श्रोता १: वातावरण से।

प्रश्न: ‘असंबद्ध’ होने का भाव महसूस होने लगा है। चाहे वो किसी जगह से हो, लोगों से हो, या अपने ही मन के भावों से हो। खोया-खोया सा महसूस करती हूँ। कहीं भी अपनेपन का भाव नहीं महसूस नहीं होता। अपने आप को कहीं से, या किसी भी चीज़ से…

मुमुक्षोर्बुद्धिरालंब-मन्तरेण न विद्यते। निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥ (अष्टावक्र गीता, अध्याय-१८, सूत्र-४४)
The mind of the man seeking liberation can find no resting place within.

श्रोता: सर, आपने एक बार कहा था कि “सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना”। इसका क्या मतलब है?
वक्ता: अभी का ही उदाहरण ले लो। पूछ रहे हो कि ‘सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना’, ये आपने क्यों कहा था? तो अभी का…

प्रश्न: सर आनंद नहीं मिल पा रहा है। आनंद कैसे पाएँ?
वक्ता: आनंद की कमी रहती है। किस-किस को कमी है आनंद की? कैसे पता है कि आनंद की कमी है? कैसे पता कि आनंद की कमी है?
श्रोता १: अगर कोई काम ज़बरदस्ती करना पड़े, तो आनंद की कमी

प्रश्नकर्ता: उपनिषद् के शुरू होने से पहले शांति-पाठ क्यों पढ़ाया जाता है?
आचार्य प्रशांत: ऐसा इसलिए क्योंकि तुममें और उपनिषदों में ज़मीन-आसमान का फासला है। जो ज़मीन पर रेंग रहा हो, जब उससे आसमान की बातें करो, तो उसे कुछ समझ नहीं आता। जो बिलकुल ठंडा पड़ा हो, उसको अगर…

हरि रासि मेरी मनु वणजारा सतिगुर ते रासि जाणी ।
-( श्री गुरु ग्रंथ साहिब)
अनुवाद : प्रभु हैं मेरा धन; मेरा मन है व्यापारी

श्रोता: सर, एक बार आपने बात की थी, मन के तीन तलों की। मन की जो शरुआत होती है, वो है, ऊपर जो भी चलता है, थोडा-थोडा। उसके नीचे आपकी वृत्तियां आती हैं, और उसके नीचे वो शांत, मौन मन, जो स्थिर होता है, वो है। जब से मैं अपनी…

वक्ता: ये जो हो रहा है, ये जो बात कही जा रही है इसको पा कैसे सकते हैं? मैं फिर वापस जाऊँगा कि ये पाने की चीज़े नहीं हैं क्योंकि ये तुम्हें उपलब्ध ही हैं।तुम्हारी भाषा विपरीत हो गयी है।
आज तक की शिक्षा ने तुम्हारी पूरी भाषा को पलट…

वक्ता: तो सवाल आया है कि साइलेंस क्या है? साइलेंस को मौन या शून्य, जो भी कहो, समझने की जरूरत है। आमतौर पर हम जिस अर्थ में ‘मौन’ शब्द का प्रयोग करते हैं, वो बड़ा ही सतही अर्थ है। होंठ ना चल रहे हों, तो हम कह देते हैं कि…

प्रश्न- सर, मेरी समस्या ये है कि मैं बहुत बोलता नहीं। मुझे अकेले रहना पसंद है।
वक्ता- आयुष, ये एक स्थिति है कि तुम्हें बहुत बात करना पसंद नहीं। ये एक सिचुएशन है, समस्या कहाँ है? स्थिति और समस्या में अंतर होता है।





Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…



पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”



“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।




प्रश्नकर्ता : आचार्य जी, अध्यात्म उपनिषद् कहता है कि तुम अहंकार को गला दो, देख लो कि तुम ये भी नहीं हो, वो भी नहीं हो। तो जो देखने वाला है, वो भी तो अहंकार ही है? कृपया प्रकाश डालें। आचार्य प्रशांत : सवाल ये है कि, “उपनिषद् कहता है…

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…





◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।


श्रोता १: जी सर।
वक्ता: ऐसा तो नहीं है कि…
(Ashtavakra Gita Chapter 18,…
बहुत सुन्दर पद है, समझेंगे। तीन हिस्से कर लीजिये।
१. हरि रासि मेरी
२.…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
This article is related to restlessness.
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९प्रश्नकर्ता: आचार्य जी,…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
अनुवाद: जब तक 'मैं' या 'मेरा' का भाव है तब तक बंधन है, जब 'मैं' या 'मेरा' का भाव नहीं है तब मुक्ति है। यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…

प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…

प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी…

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…