हर युवक या युवती के जीवन में एक पड़ाव आता ह है जब उसे ये निर्णय लेना होता है कि वे आम साधारण जिंदगी जीना चाहता है या अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। ऐसे में डर, लालच, संशय अक्सर हमारे मन को घेर लेते हैं और सही निर्णय ले पाना असंभव-सा लगता है। ऐसी स्थिति में दो ही चीज काम आती हैं: पहला, आँख खोलकर परिणाम देखते चलो और दूसरा, अपने आसपास के लोगों को देखते चलो।
मेरा एक साथी था, उसके माँ-बाप रात-दिन उसको बोलते रहते थे कि शादी कर ले। उसने एक दिन उनसे कहा, 'तुम दोनों को देखता हूँ, उसके बाद भी तुम्हें लगता है कि मैं शादी कर सकता हूँ?' उसने ये बात मजाक में नहीं कही थी। उसने कहा, 'परिणाम सामने है! अगर शादी का अर्थ ये है जो तुम दोनों मुझे रात-दिन दिखाते हो, और जैसा जीवन तुम दोनों ने जिया है, भले ही मेरे माँ-बाप हो, पर मुझे दिख तो रहा है कि कैसे हो, तो मुझे नहीं करनी शादी।
कहाँ है प्रेम ? निभा रहे हो, वो अलग बात है। लेकिन निभाना प्रेम नहीं है, कर्तव्य पूरा करना प्रेम नहीं है। अगर यह शादी है तो मुझे नहीं करनी शादी।' देखो चारों तरफ कि दुनिया कैसी है। और यही तुम्हारा भी भविष्य है, अगर बचे रहे। यह जो सड़क पर आदमी चलता है जिसको तुम 'आम-आदमी' बोलते हो, उसकी शक्ल ध्यान से देखो। वो तुम हो। और अगर वैसा ही हो जाना है, तो फिर कोई बात नहीं। फिर नई कहानी लिखने जैसा कोई सवाल ही नहीं उठता।
आज आधुनिक जगत में जो एक-के-बगल-एक परिवार बैठे हुए हैं, उसमें माता हैं, पिता हैं, उनके बच्चे हैं, दिन-रात की कलह हैं, संघर्ष हैं, जाओ और उनकी ज़िन्दगी को ध्यान से देखो। वो तुम्हारी ज़िन्दगी है। और अगर वही चाहिए, अगर वही स्वीकार्य है, तो बढ़ो आगे, किसने रोका है? क्योंकि जा तो उसी दिशा में रहे हो, जीवन उसी दिशा में ही बढ़ रहा है और बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। बहुत समय नहीं है अब तुम्हारे पास। तुम्हारी भी कहानी अब वही सब मोड़ लेने वाली है।
बिलकुल तयशुदा कहानी है, उसमें कोई बड़े उतार-चढ़ाव नहीं हैं। उस कहानी में क्या-क्या आता है बता देता हूँ। उस कहानी में आता है कुछ सालों की थोड़ी-बहुत शिक्षा, सात फेरे, मैटरनिटी वॉर्ड, दूध की बोतलें, घर पर बैठना, पैसे को लेकर चिक-चिक, दुनिया की देखा-देखी घर को फर्नीचर से भरना, कर्ज लेकर मकान खरीदना, रोज आईने में देखना कि उम्र बढ़ रही है।







