प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं की है। आजकल मोटिवेशन (प्रेरणा) देने वालों को भी देखें या कहीं भी तो मृत्यु के प्रति कोई बात दिखायी नहीं जा रही है कि वास्तविकता से कैसे सामना किया जाए।
आचार्य प्रशांत: डरे हुए हैं न। जो असली थे, उन्होंने तो सौ बार मौत की बात करी है। यहाँ 'कबीर साहब' का साखी ग्रन्थ रखा है, उसमें 'काल को अंग' है पूरा। काल को लेकर दो-चार साखियाँ, दो-चार दोहे नहीं हैं, काल का पूरा एक अध्याय है जिसमें मात्र काल की और मृत्यु की ही बात है। गुरु ग्रन्थ साहिब उठाइए, उसमें बार-बार, बार-बार मृत्यु की बात है। जीसस का जीवन देखिए, उस जीवन का शिखर ही है मृत्यु का उनका सहर्ष वरण।
आज अगर आप पायें कि अध्यात्म में जो लोग हैं वो मृत्यु की बात करने से घबरा रहे हैं तो बात बस यही है कि वो घबराये हुए हैं। जो घबराएगा, वो कतराएगा। वो कहते हैं, 'जीवन आनन्द है।' जो जीवन मृत्यु से समाप्त हो जाने वाला है, वो आनन्द कैसे हो सकता है? जिस जीवन को आनन्द बताया गया है वो भौतिक नहीं, आत्मिक जीवन है। भौतिक जीवन तो कष्ट से परिपूर्ण है।
आनन्द है वो जीवन जो न कभी शुरू होता है, न कभी ख़त्म होता है। यह जिसको आप कहते हैं ज़िन्दा होना, इस ज़िन्दगी में आनन्द हो ही नहीं सकता। हम तो ज़िन्दगी इसको समझते है न कि एक आदमी है, चल-फिर रहा है, साँस ले रहा है, खाना-पीना खा रहा है तो उसको कह देते हैं ज़िन्दा है। इसमें आनन्द नहीं हो सकता है।
जिस जीवन में आनन्द है वो वह जीवन है जो कभी शुरू ही नहीं होता। वो उस जीव के लिए है जो कभी जन्म ही नहीं लेता। वो उस जीव के लिए है जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती। समझ रहे हैं?







