श्रोता: सर, आपने एक बार कहा था कि “सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना”। इसका क्या मतलब है?
वक्ता: अभी का ही उदाहरण ले लो। पूछ रहे हो कि ‘सुनना है, शब्द के पीछे के मौन को जानना’, ये आपने क्यों कहा था? तो अभी का ही उदाहरण ले लो। आसान है, बहुत आसान है।
यहाँ तीन तरह के लोग बैठें हैं। एक वो जो नशे में इतने धुत हैं कि उनके कानों में शब्द भी नहीं पड़े। उनसे तुम ये भी पूछो कि “बैठ के आये हो दो घंटे के सत्र में, तो वक्ता ने क्या कहा?” तो वो ये भी न बता पायेंगे। वो मशीन के तल से भी नीचे हैं। क्योंकिं यदि यहाँ एक मशीन भी हो, तो भी वो क्या रिकॉर्ड कर लेगी?
श्रोता *(एक स्वर में)*: शब्द।
वक्ता: शब्द तो वो भी जान जायेगी। जो मशीन के तल से भी नीचे हैं, वो शब्द भी न बता पायेंगे। और बहुत ऐसे हैं जिनसे जब भी पूछो, “क्या कहा?” तो न बता पायेंगे। उनकी चर्चा ही व्यर्थ है। वो हैं हीं नहीं, उनका अस्तित्व है ही नहीं, वो अनस्तित्व में हैं। वो बस ऐसा लग रहा था कि वो यहाँ पधारे हुए हैं, कुर्सियों पर शरीर; वो यहाँ थे ही नहीं। उनका होना, न होना है; उनकी मौजूदगी, गैर मौजूदगी है। ये निम्नतम तल है।
फिर उससे ऊपर एक और तल है। इन्होंने ध्यान

