प्रश्न: सर आनंद नहीं मिल पा रहा है। आनंद कैसे पाएँ?
वक्ता: आनंद की कमी रहती है। किस-किस को कमी है आनंद की? कैसे पता है कि आनंद की कमी है? कैसे पता कि आनंद की कमी है?
श्रोता १: अगर कोई काम ज़बरदस्ती करना पड़े, तो आनंद की कमी महसूस होती है ।
वक्ता: तो मन का जो ना हो, जो मन के अनुसार न हो, तो उसको कहते हैं – आनंद नहीं है। “आनंद की कमी है,” माने क्या? कमी उस चीज़ की महसूस होती है, जो कभी न कभी तुम्हारे पास रही ज़रूर हो, और अब उसके होने में संदेह हो, या उसका होना पता न लगता हो, तब तुम कहते हो कि –“इस चीज़ की कमी है”। आनंद हो, या प्रेम हो, या मुक्ति हो -इनकी कमी सबको महसूस होती है।
एक ज़रा-सा बच्चा हो, या जवान आदमी, बेड़ी किसी को भी पहना दोगे, उसे अच्छा नहीं लगेगा। इसी तरीके से, नफ़रत किसी से भी करोगे, गाली किसी को भी दोगे, उसे अच्छा नहीं लगेगा। मुक्ति, प्रेम, हमारा स्वभाव है। उत्तेजना में, कष्ट में, कोई नहीं जीना चाहता। आनंद स्वभाव है, तभी उसकी कमी महसूस होती है।

