प्रश्न: ‘असंबद्ध’ होने का भाव महसूस होने लगा है। चाहे वो किसी जगह से हो, लोगों से हो, या अपने ही मन के भावों से हो। खोया-खोया सा महसूस करती हूँ। कहीं भी अपनेपन का भाव नहीं महसूस नहीं होता। अपने आप को कहीं से, या किसी भी चीज़ से संबद्ध नहीं महसूस करती हूँ। ऐसा क्यों?
वक्ता: अब तुम किसी चीज़ से संबद्ध नहीं हो पाती हो, यह तो साधारण-सी बात है। पहले तो यह बताओ कि पहले संबद्ध कैसे महसूस कर लेती थीं? वो ज़्यादा बड़ा चमत्कार है।
श्रोता १: कटा-कटा सा होने का भाव तो था, लेकिन इस बात से इतना बुरा नहीं लगता था ।
वक्ता: जिस दुनिया में हम रहते हैं, इसकी तो प्रकृति ही यह है कि ये किसी की सगी नहीं है। ‘संबद्धता’ जैसी कोई चीज़ हो ही नहीं सकती इस दुनिया में ।
आज मैं जिस दफ़्तर में गया था, वहाँ मैंने सैंकड़ों लोग देखे, बड़ा दफ़्तर था। वहाँ एक भी ऐसा नहीं था, जो वहाँ बिलौन्ग करता हो, वहाँ से संबद्ध हो। लोग अपने साधे-सधाय रस्ते से चल रहे थे, आ रहे थे, जा रहे थे। किसी का किसी और चीज़ से मतलब ही नहीं था।
ये तो प्रकृति ही है, कि कोई बिलौन्ग करता ही नहीं यहाँ किसी को। बिलौन्ग करने का अर्थ ही यही है, नज़दीकी या निकटता। वो तो है ही नहीं कहीं। यह बताओ कि बिलौन्ग करने का भ्रम कहाँ से आ जाता है? यह तो तय ही है कि कोई किसी को बिलौन्ग

