आचार्य: बोल भाई क्या चाहिए? गालिब पूछते हैं, "दिल-ए-नादां तुझे.......नादां।" रुक जाइए और पूछिये, “हाँ भाई नादां क्या हुआ है, बोलो। आओ आमने-सामने बैठ कर बात करते हैं।" यही आमने-सामने बैठना ही साक्षित्व है। आओ बात करते हैं। वह था न, वह पता नहीं, किसके पास वो गए, "महाराज मन बहुत भटकता है, क्या करें?" महाराज रहे होंगें किसी मूड (वेग) में, बोलते हैं, "उसको बोलो तुम्हें छोड़ कर चला जाए, जहां जाना है जाए।" अरे जब इतना भटकता है तो बोलो तुझे जहाँ जाना है जा। बोले बेवकूफ़ किसको बना रहे हो, तुम्हारी इच्छा के बिना वह भटक सकता है? उसको अच्छे से पता है कि जितना भी भटक ले वापिस आने के लिए दरवाज़े खुले हैं, वह इसलिए भटकता है। जैसे घर का बिगड़ा हुआ बच्चा, जिसे पता है चार दिन बाहर रहेगा, दरूबाज़ी करेगा, यह करेगा, वह करेगा, फिर भी जब लौट कर जाएगा तो माँ तैयार बैठी होगी कि "ले बेटा खाना।" उसको बोलो चला ही जाए। जा, भटक। पूरा भटक। नहीं भटकेगा। वह जीता ही रेपरेशन (दमन) में है न। उपलब्ध हो जाए, फिर नहीं।