
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति || ४, ३९ || जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ३९ प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। शत-शत नमन। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य जितेन्द्रिय, साधनापरायण और श्रद्धावान है, उसी को ज्ञान प्राप्त होता है और उसके बाद तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति को प्राप्त हो जाता है। लेकिन हम संसारी भौतिक सुख में इतने उलझ जाते हैं कि इन्द्रियों को जीतना मुश्किल सा हो रहा है। तो कृपया मार्गदर्शन करें ताकि अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकें। आचार्य प्रशांत: श्लोक ही मार्गदर्शन है। श्लोक क्या कह रहा है? श्लोक कह रहा है - जितेन्द्रिय हो तो ज्ञान प्राप्त करोगे। साधनापरायण हो तो ज्ञान प्राप्त करोगे। तो श्लोक ने साध्य और साधन दोनों बता दिए न। क्या पाने योग्य है, ये भी बता दिया और किस साधन के द्वारा उसे पाया जा सकता है, ये भी बता दिया। जो पाने योग्य है, उसका क्या नाम दिया यहाँ पर? प्र१: सहजता से भगवत्प्राप्तिरूप शान्ति। आचार्य: ठीक है। और साधन क्या है उस साध्य को पाने के, वो साधन क्या बता दिए? प्र१: श्रद्धावान होना, साधनापरायण और जितेन्द्रिय। आचार्य: तो बात सीधी है। जिसे ज्ञान पाना है, जिसे सहज ही भगवत्प्राप्ति करनी है, उसके लिए ये तीन साधन हैं। अब आप अगर पूछेंगे कि इन साधनों पर चलने के लिए क्या साधन है, तो कोई उत्तर नहीं हो सकता। ये साधन ही तो बताए गए हैं, ये उपाय ही तो बताया गया है। कहा गया है कि अगर इन्द्रियगत सुख से कृष्ण ज़्यादा प्यारे हों तो इन्द्रियों को छोड़ो, बँधन बुरे लगते हों तो साधनापरायण हो जाओ, साधना करो। साधन तभी काम आता है जब सर्वप्रथम साध्य के लिए प्रेम हो आपके पास, नहीं तो कोई साधन काम नहीं आएगा।
इसीलिए जानने वालों ने यह तक कह दिया है कि साधनों की कोई विशेष उपयोगिता है नहीं, क्योंकि साध्य के लिए, जो चाहिए, जो लक्ष्य है, उसके लिए अगर प्रेम होगा तो प्रेम स्वयं साधन ढूँढ लेता है। प्रेम है तो साधन उभर ही आता है। कोई बड़ी बात नहीं है। और प्रेम नहीं है तो आप अपनी सारी ऊर्जा साधन खोजने में, साधनों के विकास में, अविष्कारों में लगाते जाएँगे, एक-से-एक साधन तैयार होते जाएँगे लेकिन जो चाहिए, वो मिलेगा नहीं; क्योंकि वो आपको वास्तव में चाहिए ही नहीं। ये श्लोक उत्तम उदाहरण है। एक वो है, इन्द्रियातीत है, एक वो है, इन्द्रियगत है। तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम जितेन्द्रिय हो जाओ। अगर वो चाहिए जो हाथ से पकड़ में नहीं आना, आँखों से दिखाई नहीं देना, जिसका चिंतन-मनन नहीं किया जा सकता, जिसको पकड़ करके घर में नहीं रखा जा सकता—उसी का नाम इन्द्रियातीत है न, वो इन्द्रियों के आगे की बात है—अगर वो चाहिए, तो उन सब से अपनी ऊर्जा हटानी पड़ेगी जो विषय इन्द्रियों के ही दायरे में आते हैं। इन्द्रियों के दायरे में क्या-क्या चीज़ें आती हैं? सब चीज़ें आती हैं। तो बहुत सीधा हिसाब, बड़ा स्पष्ट गणित रख रहे हैं। ये चाहिए तो इससे मुक्त हो जाओ, इसी को कहते हैं इन्द्रियों को जीतना, जितेन्द्रिय होना। अब आप पूछेंगे कि "इन्द्रियों को जीतने का क्या तरीका है?" इन्द्रियों को जीतना ही तो तरीका है। अब आप पूछ रही हैं कि "तरीके के क्या तरीका है?" तरीके का तरीका नहीं होता, उपाय का कोई उपाय नहीं होता। तो इसीलिए सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ उपाय तो प्रेम ही है। और यही प्रेम जब छटपटाहट के साथ मिल जाता है तो कमाल का विस्फोट होता है। कृष्ण के प्रति प्रेम। कृष्ण का ही दूसरा नाम है मुक्ति है। मुक्ति के प्रति प्रेम और बँधनों से उठने वाली छटपटाहट, जब ये दोनों मिल जाते हैं तो फ़िर कहना ही क्या। यही तो उपाय है। अगर अभी अपने बँधनों से छटपटाहट ही नहीं और अगर अभी मुक्ति के प्रति प्रेम ही नहीं तो कितने उपाय, कितनी विधियाँ आविष्कृत करते रहिए, आज़माते रहिए, कोई लाभ नहीं होगा।
वर्तमान समय में विधियाँ-ही-विधियाँ हैं। ये समय बड़ा अनूठा है। जैसे भौतिक आयाम में हम एक-से-एक नई ईजाद, खोज, आविष्कार होता देख रहे हैं, वैसे ही लोग लगे हुए हैं अध्यात्म के क्षेत्र में भी एक-से-एक नई खोज करने में, और वो बड़ी आकर्षक खोजें हैं। ये विधि निकली है, ये मेडिटशन निकला है, ये साधना निकली है, ये तरीका निकला है, फलाना योग निकला है, एक-से-एक उपाय निकलते जा रहे हैं, उन उपायों से हासिल क्या हो रहा है? कुछ भी नहीं, क्योंकि वास्तव में हम उन उपायों का आविष्कार कर ही इसीलिए रहे हैं ताकि वो उपाय सफल न होने पाएँ। (मेज़ पर रखे तौलिए को उठाते हुए) ये सामने पड़ा है तौलिया। एक तो है कि इसको उठा लो। कोई उपाय लगा क्या? उपाय कुछ नहीं लगा। और एक तरीका ये है कि ऐसा करते हैं, (ऊपर की ओर इशारा करते हुए) वहाँ पर एक पुली लगाते हैं और एक रस्सी बाँधते हैं, रस्सी में होगा एक हुक * । रस्सी का एक सिरा मेरे हाथ में होगा, * हुक जा करके तौलिए में फँसेगा और ऐसे-ऐसे खींचेंगे तो तौलिया उठ जाएगा। एक तरीका हो सकता है कि वहाँ सामने से ज़बरदस्त तरीके से कंप्रेस्ड एयर फेंकते हैं इतनी ज़ोर की कि ये तौलिया सीधे मेरी गोद में आ करके गिरे। और तरीका हो सकता है कि इस कमरे में कहीं वाइब्रेटर लगाते हैं जो ख़ास किस्म के वाइब्रेशन फेंकेगा। और फ़िर ये तौलिया वाइब्रेट करते-करते-करते इतना एम्पलीच्यूड पा लेगा कि उछलेगा और सीधे मेरे पास आ जाएगा। अब दस, बीस, चालीस साल आप लगा सकते हैं तरह-तरह के आविष्कार करने में, तरह-तरह के उपाय बनाने में। और करना क्या है? जो करना है, वो अति सहज है। करना यही है कि तौलिया उठाना है, लेकिन नीयत नहीं है न। नीयत नहीं है तो हम फ़िर ध्यान की नई-नई विधियाँ खोजते हैं, योग के नए-नए तरीके खोजते हैं। जो करना है वो बड़ा आसान है। करना ये है कि अहम् छोटी और कष्टदायक चीज़ है, उसे छोड़ देना है, पर छोड़ने का इरादा ही नहीं है। हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो करते हैं, और करना कुल कितना है? (तौलिया उठाते हुए) करना ये है, लेकिन बेईमान हैं, ये करने का इरादा ही नहीं है। न अपनी वर्तमान स्थिति के प्रति पीड़ा है और न ही मुक्ति से प्रेम है। तो ये नहीं करना चाहते। आडम्बर करना है ताकि अपने-आप को ये दिलासा दिए रहें कि हम भी आध्यात्मिक हैं, हम भी देखो न मुक्ति के लिए कुछ कर ही रहे हैं। तो एक बड़ा ज़बरदस्त निशानेबाज़ मँगाया गया है। वो वहाँ से गोली चलाएगा और कुछ इस तरह से गोली चलाएगा कि गोली तौलिए में लगेगी ऐसी गति से, ऐसे कोण से जैसे बिलियर्ड्स खेला जाता है। गोली इसमें लगी नहीं कि तौलिया उछलेगा और ऐसे आकर गिरेगा। अब वो अभ्यास कर रहा है, ज़बरदस्त साधना कर रहा है वहाँ से गोली चलाने की कि गोली इसमें कैसे मारूँ। तुम क्या-क्या नहीं कर सकते? पचास तरह की यात्राएँ कर सकते हो, एक-के-बाद एक विधियाँ कर सकते हो। जो न्यूनतम विधि संभव हो सकती थी, वो कृष्ण ने बता दी। उसके आगे अब हम और विधि माँगेंगे तो आत्मप्रवंचना है। हमारा इरादा ही नहीं है कृष्ण को पाने का। हमारा इरादा है जीवन को बस तरह-तरह की विधियों में बिता देने का, और ये बड़ा अच्छा तरीका है। और ये समय कुछ ऐसा चल रहा है, आज का युग कुछ ऐसा चल रहा है कि नए के प्रति हममें बड़ा आकर्षण है। तो जैसे ही बाज़ार में कोई नई विधि आती है, फ़लाने नए तरीके का मैडिटेशन आता है, तुरंत हम कूद कर पहुँच जाते हैं। डांसिंग मैडिटेशन, करसिंग एंड अब्यूज़िंग मैडिटेशन , ये सब चल रहे हैं। मैडिटेशन के नाम पर एक कमरे में बंद हो जाओ और गाली-ही-गाली दो, दीवार पर सर पटको। काम सीधा है, लेकिन सीधा काम करने के लिए दिल में प्यार चाहिए। जब वो प्यार ही नहीं तो फ़िर नौटंकी काहे कर रहे हैं हम इतनी? बात बहुत सीधी है, उसको उलझाने की कोशिश मत करो। उसको उलझाने की कोशिश करके हम बस यह कहते हैं, “अभी बात समझ में नहीं आई न, इसलिए हम मुक्ति की तरफ़ कदम नहीं बढ़ा रहे।” बात को न समझना हमारी साज़िश है; क्योंकि अगर हमने ये कह दिया कि बात समझ में आ गई है, तो फ़िर हमें उत्तर देना पड़ेगा कि बात समझ में आ गई है तो आगे क्यों नहीं बढ़ रहे, रुके क्यों हुए हो? तो हम कहते हैं, “अध्यात्म तो बड़ा गूढ़ है न, रहस्यमयी है।" और जो ग्रन्थ जितना तिलिस्मी लगे, जो गुरु जितनी बेसिर-पैर की, समझ-बूझ से बाहर की बात करे, वो हमें उतना आकर्षक लगता है। "बढ़िया है, सुरक्षा है, इनकी बात ऐसी है कि समझ में तो आ नहीं सकती। जब समझ में नहीं आ सकती तो फ़िर उसको प्रयोग में उतारने का खतरा भी नहीं है; क्योंकि अगर सीधी बात पता चल गई तो बड़ा खतरा उठाना पड़ेगा, उसको लागू करना पड़ेगा, भाई। लागू न करना पड़े इसके लिए अच्छा है कि वो वहाँ बैठकर ब्रह्मज्ञान देते रहें, हम यहाँ बैठकर कहें, 'ठीक, तुम अपनी दुनिया में ब्रह्मज्ञान दो, हमारी दुकान अलग चल रही है'।” कोई विधि नहीं है वैसी जैसी अखबारों में, वेबसाइट पर और विज्ञापनों में आती है, 'ये नया जादुई फल आया है। बैठे-बैठे एक सप्ताह में दो-सौ किलो वज़न कम करें।' और हम बिलकुल बावले हो जाते हैं, “वाह, वाह, वाह, वाह!” वज़न घटाना है तो साधना करनी पड़ेगी, दौड़ लगानी पड़ेगी। पर जब हम कहते हैं, “गुरूजी, कोई विधि दे दीजिए”, तो हमारा इरादा वैसा ही होता है। विज्ञापन आते हैं, ‘खा करके वज़न कम करें’। नहीं, अगर वज़न कम करना है तो खाना भी कम करना पड़ेगा, शारीरिक गतिविधि भी बढ़ानी पड़ेगी। ये जो हमारी माँग है, यही माँग फ़िर हमें दुनिया के बाज़ार में लुटवाती है। "और आसान विधि दो न, और आसान विधि दो न", तो लोग आ जाते हैं और आसान विधियाँ ले करके। ‘बैठे-बैठे खाइए और वज़न अपने-आप कम हो जाएगा!’ ऐसे विज्ञापन देखे हैं कि नहीं? और खूब चलते हैं। वैसे ही गुरुओं का बाज़ार गरम हैं, जो आपके पास आते हैं और कहते हैं, “ना, ज़िन्दगी जैसी चल रही है, मस्त है। बस ऐसा किया करो कि तांबे के लोटे में पानी पिया करो और सुबह साढ़े चार बजे उठकर फ़लानी क्रिया कर लिया करो, सब ठीक हो जाएगा।” ना रिश्ते बदलने हैं, ना मन बदलना है, ना आमदनी का स्रोत बदलना है, ना घर बदलना है, ना दफ़्तर बदलना है; तुम्हें बस तांबे के लोटे में पानी पीना है। और हम कहते हैं कि "अब ठीक उपाय मिला, अब बढ़िया है।" कोई श्रम ही नहीं और भगवत्प्राप्ति भी हो जाएगी। जहाँ श्रम नहीं, वहाँ प्राप्ति नहीं। मूल नियम समझ लीजिए, बताने वाले बता गए, बिना मरे बैकुंठ नहीं मिलता। जो लोग सस्ते उपायों और शॉर्टकट्स की तलाश में हों, अध्यात्म उनके लिए नहीं है।
पर आप सस्ता उपाय माँगोगे, शॉर्टकट माँगोगे तो बाज़ार में उसकी उपलब्धता हो जाएगी। कल हम कह रहे थे न, आप जो कुछ भी माँगते हो बाज़ार उसकी आपूर्ति कर देता है, वहाँ तो सप्लाई (आपूर्ति) और डिमांड (माँग) का खेल है। आपने कहा कि "मुझे हाथ-पाँव नहीं हिलाना, कोई साधना नहीं करनी, कोई चोट नहीं खानी, कोई कष्ट नहीं सहना, कोई पीड़ा नहीं सहनी और उसके बाद भी मुझे मुक्ति चाहिए" तो कई दुकानें आपको खुली मिल जाएँगी जो आपसे कहेंगी, “आओ, आओ। कुछ बदलना नहीं पड़ेगा, कोई चोट नहीं खानी पड़ेगी। सब तुम्हारे सुख-सुविधाएँ पहले की तरह ही चलेंगे, पूर्ववत, और उसके बाद भी तुमको सत्य भी मिल जाएगा, मुक्ति भी मिल जाएगी, अध्यात्म का तमगा मिल जाएगा, सब मिल जाएगा। आओ, आओ।” वैसी चीज़ हो नहीं सकती। बार-बार और नए-नए उपाय मत माँगिए। अभी कल ही एक वीडियो मेरा पब्लिश (प्रकाशित) हुआ है, उसका शीर्षक है, ‘अध्यात्म में नए आविष्कार नहीं होते, तुम पुरानी ही सीखों पर चलना’। अध्यात्म में कुछ भी नया नहीं होता। यहाँ नए आविष्कार थोड़े ही होंगे प्रयोगशाला में, कि गुरूजी अभी-अभी हिमालय से उतरे हैं और वो नए किस्म का योग ले करके आए हैं। और आजकल चल रहा है, बिलकुल नई कहानियाँ प्रचारित-प्रसारित की जा रही हैं। योग की ही नई-नई परिभाषाएँ आ रही हैं। शिव के बारे में ही नई-नई कहानियाँ फैला दी गईं, कि शिव वो नहीं हैं, मैं बताता हूँ शिव कौन हैं। हिमालय पर एक आदमी रहा करता था, उसका नाम शिव है। पुराने ग्रंथों को पढ़ो, उपनिषदों के पास जाओ अगर ज्ञान चाहते हो। और संतों के पास पास जाओ, भक्त कवियों के पास, भक्त संतों के पास जाओ अगर प्रेम मार्ग चाहते हो। इतना मैं तुमको आश्वस्त किए दे रहा हूँ कि जो तुमको अष्टावक्र के पास नहीं मिल रहा और जो तुमको कबीर साहब के पास नहीं मिल रहा, वो झूठा ही होगा। कोई बात अगर ऐसी है कि न अष्टावक्र ने कही है ज्ञान मार्ग में और न कबीर साहब ने कही है प्रेम मार्ग में तो उस बात को जान लेना कि फ़र्ज़ी है। ये किसी का नया नवेला आविष्कार है, बिलकुल झूठा, बिलकुल फ़र्ज़ी।
तो अध्यात्म के नाम पर आप कितनी भी बातें सुनते हों, उनको इन दो कसौटियों पर कास लीजिएगा, यही तराजू हैं, इन पर तौल लीजिएगा। वो बात अष्टावक्र ने कही क्या? वो बात कबीर ने कही क्या? और जब मैं कबीर कह रहा हूँ तो मेरा आशय वो पूरी धारा है जो कबीर के रूप में प्रकट होती है। जब मैं कबीर कह रहा हूँ तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं तुलसीदास से, या फरीद से, या नानक साहब से या रूमी से इन्कार कर रहा हूँ। मेरा कहना यह है कि वो जो पूरी धारा ही है जो गोरखनाथ से शुरू होती है, आज तक चल रही है, बीच में उसमें बुल्लेशाह भी आते हैं, उस पूरी धारा के सबसे सशक्त प्रतिनिधि कबीर हैं। सैंकड़ों संतों ने जो कहा वो कबीर साहब की वाणी में समा जाता है। और सब ज्ञानियों ने जो कहा वो अष्टावक्र की वाणी में समा जाता है। और विधियाँ न कबीर साहब बताते हैं, न अष्टावक्र बताते हैं; वो ज्ञान बताते हैं, वो प्रेम बताते हैं। यही तो विधि है, ज्ञान विधि है, प्रेम विधि है। ज्ञान किसका? अपने बँधनों का ज्ञान। और किसका ज्ञान होगा? आत्मा का कोई ज्ञान नहीं होता। और प्रेम किसके प्रति? मुक्ति के प्रति। बँधनों का ज्ञान होता है, मुक्ति से प्रेम होता है। इन दो के अलावा कोई और ज़रिया, कोई और रास्ता होता नहीं।
तुम लगा लो नए-नए रास्ते, उससे कुछ नहीं होगा, वॉमिटिंग योगा, शहनाई योगा। ये मैं मज़ाक भर नहीं कर रहा हूँ, ये वाकई है, अभी चल रहा है ये सब कुछ। और आपमें से कुछ लोग हो सकता है कभी-कभार फेरे लगा आते हों। बात को सीधा रखिए, सरल रखिए, ईमानदार रखिए। जो सीधा है वो टेढ़े-मेढ़े रास्तों से चलकर नहीं मिलेगा। प्र२: इसी संसार में रहते हुए बँधनों से मुक्त हुआ जा सकता है कि नहीं? आचार्य: संसार माने क्या? प्र२: घर-परिवार, कामकाज। आचार्य: वही संसार है? वही है? कभी-कभी होटलों में जाइए तो वहाँ एक घड़ी लगी रहती है बड़ी लम्बी सी, वो कम-से-कम छः-सात जगह का समय एक साथ बता रही होती है। इस वक़्त अमेरिका में बहुत लोग नाश्ता कर रहे होंगे सुबह का, यूरोप में लोग दफ़्तर का काम ख़त्म करके घर आने के लिए निकल रहे होंगे, जापान में अब मज़े में सो चुके होंगे। आप जिन जगहों पर गए हैं और वो जगहें आपको बड़ी प्यारी लगी हैं, वो जगहें आपके चले जाने से ख़त्म तो नहीं हो गईं। अभी आप यहाँ मौजूद हैं, इस वक़्त आपका घर भी है और वहाँ कुछ हो रहा है। जिन होटलों में आप रुके हैं पिछले दस सालों में, वो होटल भी हैं, वहाँ भी कुछ चल रहा है। जिस कमरे में आप थे, वो कमरा आज भी होगा। आप कमरा नंबर १०६ में रुके थे, वो कमरा आज भी होगा। आप कहीं गए थे घूमने, आप किसी बीच (समुद्रतट) पर बैठ कर आए थे, जिस जगह आप बैठे थे, वो जगह आज भी होगी, लहरें वहाँ अभी भी आ रही होंगी। संसार माने क्या? आठ-सौ करोड़ लोग हैं संसार में और आठ-सौ करोड़ जगहें हैं संसार में। किसने आपसे कह दिया कि संसार का मतलब है आपका ‘दो बाय दो’? ये बोल किसने दिया आपसे कि, "आचार्य जी, संसार में रहते हुए भी क्या आध्यात्मिक साधना हो सकती है?" अध्यात्म का मतलब ही है कि तुम्हें संसार का वास्तविक अर्थ समझाए। तुम संसार के नाम पर एक दो बाय दो की सेल में रह रहे हो, वो संसार नहीं है। उसमें रहना कहलाता है कुँए का मेंढक होना, वो बोलता है संसार, संसार। और उससे पूछो, "संसार माने क्या?" तो वो बोलता है, "ये ही कुँआ।" वही है संसार? और फ़िर बार-बार, “नहीं देखिए, यही संसार है, इसमें रह करके बताइए मैं विश्व विजेता कैसे हो सकता हूँ?” आज शनिवार है न? अभी समय क्या हुआ? डिस्को थेक्स में म्यूज़िक (संगीत) शुरू हो गया होगा। शनिवार है आज, सवा दस पर धीरे-धीरे शुरू हो जाता है। कितने संसार हैं। तुमसे किसने कह दिया कि वही संसार है जहाँ तुम रहते हो? कि दस बजे सो गए, शनिवार हो कि शुक्रवार हो, डाली चादर और सो गए।