एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के अनुसार उन्हें युद्ध इसलिए नहीं करना है कि उन्हें कुल के धर्म की बड़ी चिंता है। कुल का धर्म बचाना है, कुलधर्म नष्ट हो गया तो पाप सारे कुल को दबा लेगा। तो सार्वजनिक हित में अर्जुन कह रहे हैं कि, ‘मुझे युद्ध नहीं करना है। नहीं, नहीं मेरे मोह इत्यादि की तो कोई बात ही नहीं है। मैं तो एक वीर, निरपेक्ष, निस्पृह क्षत्रिय योद्धा हूँ। मोह इत्यादि तो मुझे छू नहीं जाते। वो तो बात यहाँ कुलधर्म की है, मैं इसलिए युद्ध नहीं करना चाहता। बड़ी गंभीरता से, बड़ी निष्पक्षता से मैं आपके सामने एक संवेदनशील मुद्दा रख रहा हूँ, कृष्ण। भावुकता वगैरह की कोई बात नहीं है। ना मुझे कोई भाव है, ना मुझे कोई मोह है, मैं तो एक गंभीर वयस्क की भाँति कुल के लाभ की बात कर रहा हूँ।‘
जैसे हम सब गंभीर वयस्क होते हैं और बड़ी बुद्धिमत्तापूर्ण, बड़ी परिपक्व बातें किया करते हैं — ऐसा है वैसा है। बस इतनी-सी बात है कि हमारे ये सब परिपक्व और गंभीर बातों के पीछे, हमारी बचकानी, अधपकी वृत्ति छुपी होती है। थोड़ी देर पहले क्या कह रहे थे, सारे विचार कहाँ से आते हैं? वृत्ति से आते हैं। विचारों ने गंभीरता का चोला पहन रखा होता है। उनका व्यवहार ऐसा होता है, उनका व्यक्तित्व ऐसा होता है, उनका चेहरा ऐसा होता है कि लगता है कि कोई गहरी बात है, कोई पकी हुई बात है। जबकि उनके स्रोत में क्या होती है? कोई बालक वृत्ति। ‘मेरा सेब छिन गया’, ‘मुझे फलाने की शकल नहीं पसंद आ रही’, ‘मुझे डर लग रहा है मुझे अँधेरे में बंद कर देंगे’, ‘मुझे डर लग रहा है मुझे अकेला छोड़ देंगे’ — इस तरीके की, बालक जैसी या पशु जैसी वृत्तियाँ।





