श्रोता: सर, एक बार आपने बात की थी, मन के तीन तलों की। मन की जो शरुआत होती है, वो है, ऊपर जो भी चलता है, थोडा-थोडा। उसके नीचे आपकी वृत्तियां आती हैं, और उसके नीचे वो शांत, मौन मन, जो स्थिर होता है, वो है। जब से मैं अपनी वृत्तियां देखने लग गया हूं, जो आलसी है, जो टाल-मटोल करता है, तो मैं ये पता हूं कि वो वृत्तियां, जब भी मैं उन्हें तोड़ने की कोशिश करता हूं, वो और तेजी से वापस आती हैं। जैसे की अगर मैंने सोच लिया कि मैं आलसी नही होऊंगा और मैं काम करूंगा, तो मुझसे वो काम अब पहले जैसा भी नही होता।
वक्ता: ये, कौन कह रहा है कि ‘मैं आलसी नही होऊंगा’?
श्रोता: अहंकार।
वक्ता: वृत्ति ही तो कह रही है? वृत्ति से लड़ते नही हैं, वृत्ति से लड़ा नही जाता। जानना काफी है कि ये वृत्ति है। क्योंकि वृत्ति से लड़ने वाली एक दूसरी वृत्ति बैठी होगी। बोध, ‘अकर्ता’ है। वो कुछ भी नही करता, तो लड़ेगा कैसे? ‘बोध अकर्ता है’, इसको याद रखो। ये कुछ करता नही है। ये केवल जान लेता है।
श्रोता १: जान लेता है।
वक्ता: हां। और इस जानने में सही क्रिया अपने आप हो जाती है।
श्रोता १: सर, मुझे नही पता कि सही क्रिया क्या है।


