सनातन धर्म क्या है? सनातनी किसे मानें? (पूर्ण सत्र) || आचार्य प्रशांत, कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो। जिस पर समय का असर न पड़ता हो उसको कहते हैं सनातन। मन में जो कुछ भी है वो समय का ही दिया हुआ है। ठीक। और दुनिया में भी आप जो कुछ देखते हैं वो किसी समय पर शुरू हुआ था, किसी समय पर उसने जन्म लिया था और किसी समय पर उसकी समाप्ति है। ठीक है।
इससे हमें यह समझना होगा कि सनातन क्या नहीं होता।
जगत में जो कुछ है वह सनातन नहीं होता।
मन के विचार सनातन नहीं होते, भावनाएँ सनातन नहीं होतीं, रूप सनातन नहीं होते, परंपराएँ सनातन नहीं होतीं। क्योंकि ये सब कुछ कभी शुरू होतें हैं, कभी समाप्त होतें हैं, मन की ही उत्पत्ति होते हैं और जगत में ही स्थित होते हैं। जो कुछ भी यहाँ हो कि वहाँ हो, वो सनातन नहीं हो सकता। तो सनातन धर्म का फिर लक्ष्य यही होता है कि आपको उस सब के पार ले जाए जो मरणधर्मा है। जो कुछ भी मन में है या संसार, माने प्रकृति में है, वो सब मरणधर्मा है।
तो सनातन जो होता है उसको फिर कहते हैं सत्य। सत्य वह जो परिभाषा से ही नित्य है। नित्य माने जो कभी बदल नहीं सकता; न जन्मा है न मरेगा; न सोचा गया है न अनुभव किया गया है; कोई देखने की वस्तु नहीं है, कोई सुनने की बात नहीं है।




