एकांत नहीं है कोना निर्जन, कैवल्य नहीं कोरा सूनापन || आचार्य प्रशांत (2014)

वक्ता: सवाल यह है कि अपने आप को एकांत में वियुक्त कैसे रखें कि हम शान्ति और खामोशी महसूस कर सकें?
अधिकांश समय जब हम अकेले होते हैं तो हम वास्तव में अकेले नहीं होते। मन तो हमेशा किसी के संग में ही रहता है, मन को तो कोई दूसरा ही चाहिए। मन को तो कोई दूसरा चाहिए ही चाहिए साथ रहने के लिए और वो कोई दूसरा खोज निकालेगा, ये पक्का समझ लीजिए। वो बहुत बेसब्रा है और बहुत ताकतवर भी है। कुछ न कुछ वो खोज निकालेगा साथ के लिए। किसी न किसी के साथ होना है उसको। इसी बात को हम विचार कहते हैं, इसी को वस्तु कहते हैं, इसी को व्यक्ति कहते हैं। मन को कुछ न कुछ चाहिए। अकेला वो रह नहीं सकता। आप उसको अगर बिलकुल ही काट देंगे सबसे तो वो अपने ही दो हिस्से कर लेगा ताकि कोई मिल जाए साथ रहने के लिए। वो इतना बेसब्रा है। समझ रहे हैं?
एक ही तरीका है आपके पास, अगर आप ये कह रहे हैं कि कैसे हम वास्तव में एकांत पा सकते हैं। एकांत में होने का मतलब समझते हैं? एकांत में होने का मतलब ये नहीं है कि मेरे आस-पास में कोई नहीं है। एकांत में होने का मतलब है कि मैं समझ गया हूँ कि आस-पास तो हमेशा कुछ न कुछ रहेगा ही, कोई न कोई परिस्थिति तो होगी ही होगी और मन जैसी भी परिस्थिति होगी, उसी में उलझ जाना चाहता है।
वास्तविक एकांत इस बात का स्वीकार है कि हमेशा आपके आस-पास कुछ न कुछ चलता ही रहेगा लाख कोशिशों के बाद भी।
मैं जितना भी कोशिश कर लूँ कि परिस्तिथियाँ ठीक रहें, अनुकूल रहें, शांत रहें पर जीवन ऐसा है कि उसमें कुछ न कुछ उठता ही रहेगा, चलता ही रहेगा। एकांत का मतलब हुआ कि मैं समझूँ कि जो कुछ भी चल रहा है उसमें ‘वही’ चल रहा है। एकांत का मतलब है ’दैट अलोन इज़’, जो भी हो रहा है, वही हो रहा है।

