प्रश्नकर्ता: उपनिषद् के शुरू होने से पहले शांति-पाठ क्यों पढ़ाया जाता है?
आचार्य प्रशांत: ऐसा इसलिए क्योंकि तुममें और उपनिषदों में ज़मीन-आसमान का फासला है। जो ज़मीन पर रेंग रहा हो, जब उससे आसमान की बातें करो, तो उसे कुछ समझ नहीं आता। जो बिलकुल ठंडा पड़ा हो, उसको अगर अचानक सूरज की रोशनी दिखा दो, तो उसकी आँखें चौंधिया जाती हैं। जिसके शरीर में गर्मी ना हो, अगर उसे अचानक ज़ोर से दौड़ा दो, उसकी माँससपेशियाँ खिंच जाती हैं।
जिसका मन शंकाओं से, डर से, वहम से, घृणा से भरा हुआ है, वो जब उपनिषद् के पास भी जाता है, वो जब गुरु के पास भी जाता है, तो अपने सारे वहम, घृणा और शक़ लेकर ही जाता है। यह उचित नहीं है कि गुरु उससे बात करे। क्योंकि जो कुछ भी गुरु बोलेगा, उसे वो वहम के पीछे से ही सुनेगा। शांति-पाठ इसीलिए होता है ताकि तुम तैयार हो सको। वरना फिर समझ लो कि उसके बिना कुछ समझ में आएगा नहीं। उसके साथ भी समझ में आ जाए, ऐसी कोई आश्वस्ति नहीं है। पर उसके बिना तो बिलकुल कुछ समझ में नहीं आएगा।
इसीलिए तुम लोगों से कहता हूँ कि अगर सत्र का समय साढ़े छः बजे का है, तो छः बजे आ जाओ, शांति से बैठ जाओ। यहाँ कुछ पढ़ो, कुछ सुनो, कुछ लिखो, ज़रा तैयारी तो कर लो। तुम उत्तेजना में तप रहे हो। अचानक फुहार पड़ गयी, तो बुखार आ जाएगा। तुम्हारे मन पर तुम्हारी दुनियादारी के विचारों का कब्ज़ा है। अचानक सत्य की बात छिड़ गयी, तो तुम्हारा मन विद्रोह कर देगा।
एक पिक्चर देखने जाने में, और सत्संग में बैठने में, बड़ा अंतर होता है। जो पिक्चर तुम परदे पर देखते हो, वो तुम्हारी ही दुनिया की कहानी है। वो तुम्हारी ही रुचि के लिए बनायी गयी है। वो बनायी ही ऐसी गयी है कि तुमको पसंद आए, तुम्हारे भ्रमों को क़ायम रखे, तुम्हारे संस्कारों के अनुरूप हो। वहाँ पर तुम ठीक उसी क्षण भी जाकर बैठ जाओ जब पिक्चर शुरू हो रही है, तो कोई हर्ज़ा नहीं है। क्योंकि जैसे तुम हो, वैसी ही वो पिक्चर है। कुछ बदलना ही नहीं है। जिस बहाव में तुम थे, जिस रौ में तुम थे, उसी रौ में रहे आओ।

