पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: पृथ्वी को बचाने के लिए बिल्कुल जमीनी बात बता रहा हूँ। पृथ्वी को बचाने के लिए जो यूनाइटेड नेशंस की सीओपी होती है (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़), उसने बहुत साफ-साफ साइंटिफिक डेटा के साथ यह शर्त रखी थी कि हमें अपने कार्बन एमिशंस इतने कम करने हैं कि 2030 तक भी जो ग्लोबल टेंपरेचर है, वह 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए।
2025 आ गया है। और हम जो 1.5 डिग्री का थ्रेशहोल्ड था, जो सीमा रखी गई थी, हम उसको 2025 में ही लांघ चुके हैं। और यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। तो उसके लिए जो "ऑपरेशन 2030" है, उसी की बात हो रही है, क्योंकि हमने अपने लिए यह लिमिट तय की थी कि 2030 तक भी ऐसा न हो। इतने एमिशंस हैं, उनको रोक कर के रखना है। वह तो हमने टेंपरेचर की सीमा 2025 में ही लांघ दी है।
मैं इसमें थोड़ा-सा आपको और विस्तार से बताता हूँ। हमने — पूरी दुनिया ने, सब देशों ने मिलकर के — ख़ुद से यह वादा किया था कि 2019 में जितने ग्लोबल कार्बन एमिशंस हैं, कार्बन डाइऑक्साइड का जो उत्सर्जन है, हमें उसको 2030 तक 43% कम कर देना है। 2019 की तुलना में हमें 2030 तक 43% की कटौती करनी थी। अब 2019 से 2030 के बीच में 2025 तो आ चुका है, और वह 43% कम होने की जगह शायद थोड़ा बढ़ गया है, या उतने का उतना ही है, या अगर कम हुआ भी है तो बस 2% ही कम हुआ है।




