

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं नौवीं कक्षा में था तब से ओशो को, एक बुक (पुस्तक) मिली थी मुझे लाइब्रेरी (पुस्तकालय) में गाँव के, तब से मैं पढ़ रहा हूँ उनको। फिर मेरी सरकारी नौकरी लगी तो मुझे लगा कि नौकरी से सब अच्छा हो जाएगा और मैं अध्यात्म को और…

यही जीवन जीने की कला है, मौज करो, मस्ती करो! गंभीर मत हो जाना। बिलकुल हल्के रहो, क्योंकि रखा क्या है?
आज तुम जिस बात को गंभीरता से लेते हो, कल वो तुम्हारे लिए दो पैसे की हो जाएगी। याद है, जब चौथी-पाँचवी में

प्रश्नकर्ता: ओशो ने जाति-स्मरण के बारे में काफ़ी बोला है। वे अपने शिष्यों को बोलते थे कि तुम जाति- स्मरण में जाओ, उससे तुम्हें साधना में मदद मिलेगी।
जाति-स्मरण क्या है और इसमें कैसे जाया जाए?
आचार्य प्रशांत: कल वो कुत्ता हमारे साथ बाहर निकला, बाकी सबने उसपर भौंकना शुरू…

भीतर की ओर मुड़ना ही, आत्मा है।
जब मन भीतर की ओर मुड़ता है, वह घुल जाता है।
~ ओशो
कार्य को सामने ला दो कारण प्रकट हो जायेगा।
~ रमण महर्षि
वक्ता: दो बातें हैं, दोनों को आमने-सामने रखा गया है। रमण कह रहे हैं मन ही…

प्रश्नकर्ता: एक विचार बरक़रार ही रहता है कि 'क्या लोग सोचते हैं या क्या है छवि?' कभी थोड़ा कम दिखता है पर रहता ही है। फिर ये क्यों है, ऐसा सब के साथ तो नहीं है, जैसे अभी कोई छोटा कुत्ता है, तो उसके लिए तो मैं नहीं सोच रहा…

आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) "नाम तो मेरा लक्की है पर मैं बहुत अनलक्की हूँ। मैं पिछले नौ साल से यू.पी.एस.सी. की तैयारी कर रहा हूँ। चार बार फ़ेल हो चुका हूँ, नौ साल से घर से बाहर हूँ और अब घर लौटने में डर लगता है। यू.पी.एस.सी. के अलावा…