
लड़का-लड़की पंद्रह साल के हुए नहीं कि माँ-बाप बन सकते हैं, फिर? बहुत अक्ल आ जाएगी उनमें? और फिर जो बच्चा पैदा हो उसको सिखाएँ कि, “यह देवी-देवता हैं, हमने पैदा किया है।“ वह देवी-देवता ने नहीं पैदा किया है, वह पैदा इसलिए हो गया था क्योंकि देवी जी बहकी…

कहते हैं, “हमारे घर में बहुत खुला हुआ माहौल है। मैं तो अपने चौदह साल के लड़के के साथ बैठ कर ड्रिंक करता हूँ। बहुत लिबरल माहौल है हमारे घर का।“
ये लिबरल माहौल है या नरक का माहौल है? नरक और कौन-सी जगह होती है? वही तो जहाँ बाप…

जो भी लोग अपने बच्चों को ये तर्क देते हों कि, “हम बताएँगे तुमको, हमने ज़िंदगी देखी है”, उन्हें तो सबसे पहले अस्पतालों में दाखिला नहीं मिलना चाहिए। बाहर लगा होना चाहिए, ‘जिन्होंने ज़िंदगी देखी हो वो अपना उपचार ख़ुद ही कर लें।‘ भाई तुम तो ज़िंदगी देख-देख कर ही…

ऐसा तो नहीं है कि दस-बारह साल के बच्चे को अगर आप रामकृष्ण की बोध कथाएँ पढ़ाएँगे तो उसे समझ में नहीं आने वाली। आएँगी न। आपके घरों में क्यों नहीं है रामकृष्ण परमहंस की सरल साधारण कथाओं की किताब? कृष्णमूर्ति साहब का साहित्य आता है ‘*कृष्णमूर्ति फॉर द यंग*’।…

इज़रायल की टीनएज (किशोर) लड़कियाँ फ़ौज में जाती हैं, और शहीद हो चुकी हैं।
और मेरे देश की लड़कियाँ क्या कर रही हैं? वह टिक-टॉक पर और इंस्टाग्राम पर कूल्हे मटका रही हैं।
किसी ने मुझे तस्वीर भेजी जिसमें इज़राइल की बच्चियाँ खड़ी हुई हैं, उनके कंधों पर बंदूकें हैं

तुम छः-छः, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और, ‘मैं तो तेरा बटर-चिकन हूँ’ और इस तरह के गानों पर नचा रही हो, यह कला है? आग लगे ऐसी कला को! देखो न वह किस तरीके की भाव भंगिमा दिखा रही है, देखो वह आँखों से कैसे इशारे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी अभी कुछ दिनों पहले शहीद दिवस था, तब आपसे एक प्रश्न पूछा था जो कि कायरता और वीरता के ऊपर था। तब आपने वहाँ उत्तर देते हुए कहा था कि ये एक माँ पर निर्भर करता है कि उसका जो सपूत है वो कायर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, अभी तो मनोस्थिति मेरी शांत है। हमने कोशिश करके दूसरों में परिवर्तन ढूँढना बंद कर दिया है। चिंता बस यह है कि कहीं बहुत ढील दे दूँ तो बच्चे ग़लत मार्ग पर ना निकल जाएँ, अकेले ना हो जाएँ।
आचार्य प्रशांत: यह जितने बच्चे तुम्हें बिगड़े…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिद्दू कृष्णमूर्ति जी की एक किताब पढ़ रहा हूँ। उसमें वो कई बार वर्णन करते हैं कि अभी का जो करेंट एजुकेशन सिस्टम (वर्तमान शिक्षा व्यवस्था) है, वो ग़लत जा रहा है। तो उनका कहना था कि हमारा एजुकेशन सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिससे हम फ्री…

प्रश्नकर्ता: बच्चों के प्रति व्यवहार कैसा होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देख लीजिए कि बड़े हो गए हैं। जिस किसी को आप रिश्ते, नाम, या उम्र के संदर्भ में देखेंगे उसे आप देख ही नहीं पाएँगे। आपके लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है बेटे को पहचानना। पूरी दुनिया बेटे को जान…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं यहाँ कैंप में आई हुई हूँ और मेरी बेटी की आज एक परीक्षा किसी कारणवश छूट गई, बड़ी ग्लानि अनुभव कर रही हूँ।
आचार्य प्रशांत: हम लोग ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ने में भी बड़े माहिर होते हैं। ग्लानि भाव ले लेने को बड़े आतुर होते हैं। अब ऐसे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को कैसे समझाया जाए जीवन के विषयों पर?
आचार्य प्रशांत: आप उनके प्रति सद्भाव से भरी रहिए, आप उनके प्रति शुभेच्छा से भरी रहिए और अपना परिष्कार करती चलिए।
प्र: परिष्कार मानें?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक चीज़ है जो मुझे बहुत परेशान करती है। मैं इसे एक धारणा के रूप में साझा करना चाहता हूँ और इसपर आपके विचार जानना चाहता हूँ — जैसे-जैसे आप जीवन में आगे बढ़ते हैं, जीवन आपको बढ़ने में मदद करता है। जीवन विकास के बारे में…

प्रश्नकर्ता: अगर हमनें बच्चों से ये कह दिया कि जो अच्छा है उसमें अभी उतरो तो बच्चों को तो यही अच्छा लगता है कि टीवी देखें या मनोरंजन या इधर-उधर की कूद-फाँद तो फिर इसका क्या करेंगे?
आचार्य प्रशांत: कहानी पूरी देखिए - कोई बच्चा क्यों टीवी में, या इंटरनेट…

प्रश्नकर्ता: एक माँ होने के नाते मेरी वास्तविक ज़िम्मेदारी क्या है?
आचार्य प्रशांत: अब ज़िम्मेदारी का तो अर्थ ही हुआ न मुक्ति। हमनें कहा कि बच्चा पैदा होता है बंधनों में, तो बच्चे की अपने प्रति ज़िम्मेदारी हो या बच्चे के हितैषियों की बच्चे के प्रति ज़िम्मेदारी हो, सबकुछ एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? अभी जैसे अध्यात्म बेस (आधार) पर चल रहा है कि बुनियाद होनी चाहिए। अब मेरा बुनियाद तो नहीं है अध्यात्म और बच्चे पैदा हो गए ऐसे ही। तो उनका भी बेस (बुनियाद) नहीं हो पाएगा। जब मैं ही कोई बात नहीं…

प्रश्नकर्ता: मैं जबसे मदर (माँ) बनी हूँ तबसे मैं ये अनुभव कर रही हूँ कि ममता और मोह जो है वो बहुत बढ़ रहा है और डर भी बढ़ रहा है साथ में। चिंताएँ लगी रहती हैं और जब बच्चे के साथ खेलती हूँ तो बहुत एक सुख की अनुभूति…

प्रश्नकर्ता: मेरे दो बच्चे हैं — आठ वर्ष और दो वर्ष के। जबसे आपको सुनने लगा हूँ, धीरे-धीरे समझ में आने लगा है कि मुझे दूसरा बच्चा नहीं करना चाहिए था। शायद पहला बच्चा भी करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। अब मुझे जलवायु-परिवर्तन के कारण दुनिया के भविष्य की…

प्रश्नकर्ता: आपका एक वीडियो देखा, जिसमें आप बड़ी भर्त्सना कर रहे थे रियलिटी शो में बच्चियों की डांस (नाच) की। आपको रियलिटी शो में बच्चों के डांस से क्या प्रॉब्लम (परेशानी) है? डांस वगैरह तो आर्ट फॉर्म (कलाएँ) हैं, नृत्य तो एक प्रकार की कला है न, और बच्चे अगर…

प्रश्नकर्ता: बचपन में मुझे मम्मी-पापा और स्कूल ने सिखाया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और साथ ही मुझपर दबाव बनाया कुछ गिने-चुने काम ही करना। मैंने कहा — मुझे गायक बनना है। वो बोले — नहीं, तुम्हें एम.बी.ए करना है। आज मैं एम.बी.ए हूँ और बहुत दुःख…

प्रश्न: आचार्य जी, मेरा एक बेटा आठ साल का है और एक दस साल का। उनका मन बिलकुल भी पढ़ाई में नहीं लगता, वो बिलकुल भी पढ़ना नहीं चाहते। ऐसा क्या करूँ कि उनका मन पढ़ाई में लगने लगे?
आचार्य प्रशांत: तुम उन्हें पढ़ाना क्यों चाहते हो?

प्रश्न: आचार्य जी, क्या बच्चे पैदा करना ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत जी: ‘बच्चा’ माने क्या होता है? एक घर है, उस घर के लिए ‘बच्चे’ का क्या अर्थ है? परिवार में ‘बच्चे’ का क्या मायना है?
प्रश्नकर्ता: वंश आगे बढ़ाने के लिए बच्चे का होना ज़रूरी है – ऐसा लोग

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी डर की बात हो रही है। मेरा बच्चा चार साल का है। अभी कुछ समय से वो किसी अँधेरे कमरे में जाने से, या अँधेरा हो जाने पर, बहुत डरने लगा है। कोई वजह नहीं बताता है, पर बहुत डरने लगा है।
ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या विचारों का आना असहज है?
आचार्य प्रशांत: आप कहिए न! अभी आप यहाँ बैठे हुए हैं, तल्लीनता से सुन रहे हैं, कितने विचार उठ रहे हैं? कुछ ही समय पूर्व, करीब एक-डेढ़ घण्टे का सत्र हुआ था, विचार-मग्न थे क्या? या ध्यान-मग्न थे? दोनों का अंतर…

प्रश्नकर्ता: पेरेंटिंग (परवरिश) को निपुणता से कैसे किया जाए? कभी-कभी हम चाहते भी हैं करना, पर हम कर नहीं पाते, क्योंकि बाहर की स्थितियाँ ऐसी होती हैं।
आचार्य प्रशांत: जो आपने बाहरी स्थितियों के बारे में कहा, वो बिलकुल ठीक है। लेकिन निष्कर्ष दूसरा भी हो सकता है। आप यूँ…

प्रश्नकर्ता: सर, माँ-बाप कहते हैं, “पढ़ो! पढ़ो!”, तो वो बोलते हैं कि, "तुम्हारे लिए ही तो बोलते हैं!" लेकिन ऐसा लगता है जैसे वो अपने लिए ही बोलते हैं। कहीं-न-कहीं उन ही का उद्देश्य रहता है कि ये हो जाए, वो हो जाए। वो खेलता रहता है, खुश रहता है…




पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”



“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।




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\n\n29 अप्रैल से 1 मई, 2022 तक आयोजित हुए वेदांत महोत्सव के एक प्रतिभागी की प्रेरणास्पद कहानी\n\nमेरा नाम राकेश कुमार है। मैं कानपुर नगर से हूँ। पिछले चार माह से मैं हर…

हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…



प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:
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अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
यद्यपि ये…

प्रश्नकर्ता: आपकी जो बाकी शिक्षाएँ हैं वो भी मुझे बिलकुल गीता से मिलती हुई लग रही हैं। आप जैसे पहले कहते थे कि हृदय में शिव और भुजाओं में शक्ति। तो अभी आप बोले कि हृदय कोमल होना चाहिए और बलिष्ठ भुजाएँ होनी चाहिए तो बिलकुल वो बातें एक जैसी…