प्रश्नकर्ता: बच्चों के प्रति व्यवहार कैसा होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देख लीजिए कि बड़े हो गए हैं। जिस किसी को आप रिश्ते, नाम, या उम्र के संदर्भ में देखेंगे उसे आप देख ही नहीं पाएँगे। आपके लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है बेटे को पहचानना। पूरी दुनिया बेटे को जान सकती है, बाप के लिए बड़ा मुश्किल है, उनके लिए वो बच्चा है। उसे कुछ पता नहीं।
दोनों तरह के उदाहरण आपको देता हूँ। आपने बच्चों की बात कही — लायक और नालायक दोनों बच्चों का उदाहरण देता हूँ। बुद्ध के पिता थे, उनका बच्चा बुद्ध उनकी नज़र में तो बुद्धू ही था। तो वह जंगल से लौटकर आता है बड़े सालों बाद, पन्द्रह सालों बाद। और उसको क्या कर रहे हैं? उसको चपत लगा रहे हैं, कह रहे हैं "पगला, अक्ल नहीं है, राज्य छोड़कर चला गया था।" उसको उलाहना दे रहे हैं। पूरी दुनिया को दिख रहा है कि ये बुद्ध हैं। उनके लिए वो अभी सिद्धार्थ है। उन्हें दिख ही नहीं रहा। बच्चे का मोह ऐसा है कि बच्चे की महानता उनको नज़र नहीं आ रही। तो वो इसी धुन में हैं कि "अरे तू क्यों अध्यात्म के पथ पर चला गया? तू लग जा पुश्तैनी धंधे में, ये राज्य किस लिए है? यह सिंहासन किस लिए है? बीवी है तेरी और बच्चा भी तू पाए ही है। क्यों भागता है?"
दूसरा उदाहरण है दुर्योधन के पिता। वो लगे ही रहे आख़िरी समय तक, "मेरा सुयोधन, मेरा सुयोधन।" पूरी दुनिया को दिख रहा था कि क्या ज़लील हरकतें कर रहा है। एक उसके बाप को नहीं दिखा बस। क्योंकि बच्चा है न।
तो अगर कोई ऐसा होता है जो सबसे उपयुक्त स्थिति में होता है कि बच्चे की हक़ीक़त जान ले तो वो बाप है या माँ है। क्योंकि बच्चा उपलब्ध है आप उसे देख रहे हो, आप को पता ही चल जाएगा उसके क्या लक्षण हैं। और अगर कोई ऐसा होता है जिसे बच्चे की हक़ीक़त का कुछ पता नहीं लगता है कभी तो वो माँ है या बाप है। ज़माना जान गया कि दुर्योधन किस गति का है, दुर्योधन के बाप धृतराष्ट्र को नहीं पता लगा। उन्हें पता लग जाता तो महाभारत ना होती।

