प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, अभी तो मनोस्थिति मेरी शांत है। हमने कोशिश करके दूसरों में परिवर्तन ढूँढना बंद कर दिया है। चिंता बस यह है कि कहीं बहुत ढील दे दूँ तो बच्चे ग़लत मार्ग पर ना निकल जाएँ, अकेले ना हो जाएँ।
आचार्य प्रशांत: यह जितने बच्चे तुम्हें बिगड़े हुए दिख रहे हैं, यह इसलिए बिगड़े हैं कि माँ-बाप ने इन्हें ढील दे दी थी? जितने आज बच्चे देखती हो दुनिया में बिगड़े हुए, और जितने तुम बड़े देखती हो बहुत बिगड़े हुए, यह सब क्या ढील के कारण बिगड़े हैं?
सारे ही तो माँ-बाप लगे हुए हैं बच्चों का कल्याण करने में, ढील कौन देना चाहता है। ढील तो दो-चार प्रतिशत देते हैं, जो या तो बहुत ज्ञानी होते हैं या बहुत आलसी। पिचानवे-प्रतिशत लोग तो लगाम कसकर ही रखते हैं बच्चों पर। पूरा ख्याल रखते हैं, डूब कर ध्यान रखते हैं बच्चों का, और नतीजा क्या है? बड़े बच्चे सब कैसे दिख रहे हैं अपने चारों ओर? अगर ढील के कारण लोग बिगड़ने होते तो दुनिया में तुम्हें दो ही चार प्रतिशत लोग बिगड़े नज़र आते क्योंकि ढील कितनों को मिलती है? दो ही चार प्रतिशत को मिलती है। तो बिगड़े हुए दो ही चार प्रतिशत होने चाहिए थे, यहाँ बिगड़े हुए कितने हैं? यहाँ तो सब बिगड़े हुए हैं। तो ढील का बिगड़ने से कोई लेना-देना नहीं। बल्कि संभावना यही है कि तुम ढील दे दो तो पेड़ अपने अनुसार उगेगा।
जंगल में बीज गिर जाए तो बहुत संभावना है कि सुंदर पेड़ खड़ा हो जाएगा। पर अनाड़ी माली के हाथों पौधा पड़ जाए, तो उसका दुर्भाग्य है। जंगल के पौधों को, पेड़ों को ना कोई पानी देने जाता है ना खाद। उनमें से कुछ मरते हैं तो कुछ जी भी जाते हैं। पूरा जंगल यूँ ही नहीं खड़ा है। पर अनाड़ी माली के हाथों अगर कोई पौधा पड़ गया तो? बोलो। गुरु ना बन पाओ तो कम-से-कम बच्चे के जीवन में ज़रा तटस्थ हो जाना।
तो तीन कोटि के माँ-बाप हो गए। एक तो वो जो इस श्रेणी के हैं कि वो बच्चों के लिए ना माँ रहे ना बाप रहे वो सीधे गुरु ही हो गए। ऐसी पात्रता तो बहुत कम अभिभावकों में होती है। उससे ज़रा नीचे की श्रेणी के वो हुए जो जान गए कि हममें गुरु होने की पात्रता तो है नहीं तो हम ज़्यादा छेड़खानी करें ही ना बच्चे के जीवन से। हम ज़रा अलग खडे़ हो जाएँ, जैसा वो आगे बढ़ता है बढ़ लेगा। जो मूलभूत सुविधाएँ होती हैं वह हम मुहैया करा दें। उससे ज़्यादा हम हस्तक्षेप ना करें।

