प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं यहाँ कैंप में आई हुई हूँ और मेरी बेटी की आज एक परीक्षा किसी कारणवश छूट गई, बड़ी ग्लानि अनुभव कर रही हूँ।
आचार्य प्रशांत: हम लोग ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ने में भी बड़े माहिर होते हैं। ग्लानि भाव ले लेने को बड़े आतुर होते हैं। अब ऐसे तो आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी छत्तीसगढ़ में जो आपके परिवार जन हैं उनकी होनी चाहिए। आप यहाँ आईं हैं, आप पत्थर से कूद जाएँ उनको ग्लानि होनी चाहिए, कि "मैं कुछ कर नहीं पाया।"
कोई बिलकुल ही बच्चा हो तो बात अलग है अन्यथा सब अपने-अपने लिए ज़िम्मेदार हैं। और भूलिए मत कि जब आप किसी के जीवन में इस हद तक प्रविष्ट हो जाते हैं, कि वो छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आप पर निर्भर हो जाता है, तो न सिर्फ़ वो आप पर निर्भर होता है बल्कि आप उसकी ज़िन्दगी पर हक़ भी जमा लेते हैं। जिसको आप ये कहते हैं कि, "तुम्हें सुबह सही समय पर उठाने की ज़िम्मेदारी मेरी है भले ही मैं तुमसे तीन-सौ किलोमीटर दूर किसी और जगह पर हूँ", उसको फिर आप उसके मुताबिक चलने भी नहीं देंगे। आप कहेंगे, "छोटी-छोटी बातें तो मैं तय करूँ तुम्हारी और जीवन के बड़े निर्णय तुम ख़ुद ही ले लोगे? सुबह उठाने के लिए माँ थीं, और जीवन की दिशा निर्धारित करने के लिए तुम ख़ुद हो?" आप छोड़ दोगे फिर उसे? आप जिसकी ज़िन्दगी में इतनी गहराई से घुस जाओ उसको फिर आप मुक्त नहीं छोड़ पाओगे। तो भला है कि वो अपने कर्मों के सुख-दुःख स्वयं भोगे।
प्र: चिंता होती है।
आचार्य: मैं फिर आपसे पूछ रहा हूँ। जिसकी ज़िन्दगी में आप इतने प्रविष्ट हो जाएँ कि सुबह उसको सही समय पर उठाने की ज़िम्मेदारी भी आप ले लें, उसको क्या आप कुछ भी एकांत में करने देंगे अब? उसकी ज़िन्दगी के तो हर लम्हें में आप मौज़ूद रहेंगे, घुसे हुए रहेंगे। आप कहेंगे, "मुझे पता है कि तू कब सोती है, कब उठती है, कब कहाँ जाती है।" एक जवान लड़की के साथ ये करना उसके प्रति अन्याय है। वो बढ़ ही नहीं पाएगी, उसका विकास रुक जाएगा, क्योंकि वो जहाँ भी जा रही है पा रही है कि साथ में माँ लगी हुई हैं। सुबह उठाने के लिए माँ है, खाना खिलाने के लिए माँ है, घर तय करने के लिए माँ है, जीवन तय करने के लिए माँ है।

