हम सब के भीतर एक अर्जुन है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत प्रारम्भ होती है। गीता यदि सिर्फ़ कृष्ण द्वारा प्रदत्त ज्ञान है तो वो तो दूसरे अध्याय से भी आरम्भ हो सकती थी, वहाँ से नहीं आरम्भ हुई है।
मैं पहले अध्याय को और दूसरे अध्याय के आरंभिक श्लोकों को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ। गीता पर अब मैं अनेकों बार बोल चूका हूँ, मेरा सौभाग्य रहा है, और जितनी बार बोला है मैंने उतनी बार आग्रह करा है कि पहले अर्जुन के एक-एक वक्तव्य और तर्क में अपने-आपको देखिए, नहीं तो कृष्ण की बात आप पर लागू ही नहीं होगी।
कोई साधारण कृतिकार होता तो जहाँ से कृष्ण बोले हैं, गीता भी वहीं से शुरू कर देता। वेदव्यास की बात दूसरी है, उन्हें यूँ ही नहीं वेदव्यास कहा गया। अर्जुन की वृत्ति, अर्जुन की विडम्बना, अर्जुन की किंकर्तव्यविमूढ़ता, हम सबकी है। अर्जुन के तर्कों की जटिलता, अर्जुन का आतंरिक षड़यंत्र, हम सबका है। जब तक आपके मन में वो स्थिति नहीं आ जाती जहाँ आप कहें, ‘अर्जुन ने नहीं कहा, मैंने कहा’, तब तक कृष्ण की बात आपको काटेगी नहीं।
कृष्ण तो जो कुछ भी कह रहे हैं, काटने के लिए ही कह रहे हैं, वेदांत की विधि ही काटना है। गीता को गीताग्रंथ, गीता शास्त्र, या गीता उपनिषद् भी कहते हैं। वेदांत के तीन प्रमुख स्तम्भों में से एक है गीता, श्रीमद्भगवद्गीता। अन्य कई गीताएँ भी हैं, जो वेदांत में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, उनमें अग्रणी है भगवद्गीता। और वेदांत की क्या विधि? काटना। काटे नहीं तो वेदांत अपना काम नहीं कर सकता और आपको काटा कैसे जाएगा अगर आप अर्जुन ही नहीं तो? और आपको काटा नहीं गया तो गीता आप पर व्यर्थ गई न।
आप पढ़ते रहिए, गीता फिर आपके लिए साहित्य बन जाएगी; अच्छी पुस्तक है, साहित्य है बढ़िया। कुछ सामान्य ज्ञान की बातें, हो सकता है आपको कुछ श्लोक भी स्मृतिस्थ हो जाएँ। कोई पूछे तो आप भी बता दो, जैसे चलता है, 'यदा यदा ही धर्मस्य', ठीक बढ़िया। लेकिन आप कटेंगे नहीं। और जो कटा नहीं, वो अपनी ही क़ैद में रह गया। जब आप कटते हैं तभी आपके क़ैद की सलाखें कटती हैं क्योंकि अपनी क़ैद आप स्वयं हैं। आप कट ही नहीं सकते अगर आप देखें अर्जुन के वक्तव्यों को और आप चौंक ना जाएँ। आप कहें, ‘अर्जुन तो लिखा ही नहीं है, मेरा नाम लिखा हुआ है। अर्जुन कहाँ है, मैं लिखा हूँ।‘





