प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जिद्दू कृष्णमूर्ति जी की एक किताब पढ़ रहा हूँ। उसमें वो कई बार वर्णन करते हैं कि अभी का जो करेंट एजुकेशन सिस्टम (वर्तमान शिक्षा व्यवस्था) है, वो ग़लत जा रहा है। तो उनका कहना था कि हमारा एजुकेशन सिस्टम ऐसा होना चाहिए जिससे हम फ्री (आज़ाद) हो सकें। तो वो एजुकेशन सिस्टम (शिक्षा व्यवस्था) क्या है, जिससे फ्री हुआ जा सके और क्या पढ़ाया जाए?
आचार्य प्रशांत: दुनिया के बारे में तो तुम्हें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ही खूब पढ़ा देती है। तुम कौन हो, कैसे हो, तुम्हारी प्रक्रियाएँ कैसे चलती हैं, मन क्या चीज़ है — इसके बारे में कुछ नहीं बताती। तो इसीलिए अपूर्ण है ये व्यवस्था। ग़लत इसीलिए है क्योंकि अपूर्ण है, इसे पूर्णता चाहिए। पूर्णता इसमें तब आएगी जब इसमें आत्मज्ञान भी शामिल होगा।
प्र२: आचार्य जी, यदि अध्यात्म को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करेंगे तो क्या इसमें भी कट्टर पंथिता जैसी खामियाँ नहीं आ जाएँगी? क्योंकि व्यवस्था में सब कुछ बिगड़ ही जाता है धीरे-धीरे, जैसे अभी धर्म में कट्टर पंथिता आ गई है।
आचार्य: कोई भी व्यवस्था रख-रखाव माँगती है। गाड़ी भी लाते हो तो खरीद लेना काफ़ी नहीं होता, उसका रख-रखाव, मेंटेनेंस करना पड़ता है न। तो हर व्यवस्था माँगती है कि उसकी जाँच होती रहे। नियमित रूप से, सावधिक रूप से, उसपर प्रयोग और परीक्षण चलते रहें। उसकी सेहत का जायज़ा लिया जाता रहे। बनाकर छोड़ दोगे तो भ्रष्ट हो ही जाएगी।
समय सबको खा जाता है। कोई भी व्यवस्था बनाओगे, है तो सांसारिक ही, समय उसको खा जाएगा।


