प्रश्नकर्ता: एक माँ होने के नाते मेरी वास्तविक ज़िम्मेदारी क्या है?
आचार्य प्रशांत: अब ज़िम्मेदारी का तो अर्थ ही हुआ न मुक्ति। हमनें कहा कि बच्चा पैदा होता है बंधनों में, तो बच्चे की अपने प्रति ज़िम्मेदारी हो या बच्चे के हितैषियों की बच्चे के प्रति ज़िम्मेदारी हो, सबकुछ एक ही बात पर आ गया, क्या? मुक्ति, बच्चे को मुक्ति दो। तो उसको इस तरीके से सिखाना होगा, बड़ा करना होगा कि मुक्त होता चले और मुक्ति के लिए उसके मन में प्यार गहराता चले। यही ज़िम्मेदारी है और ये अच्छी-सच्ची-वास्तविक ज़िम्मेदारी है।
ज़िम्मेदारी गड़बड़ बात नहीं है पर ज़िम्मेदारी के नाम पर दूसरी चीज़ें करने लग जाएँ तो गड़बड़ है। बच्चे की माँ हो, बच्चे का शिक्षक हो, चाहे कोई भी हो अगर वो किसी बच्चे को मुक्ति की दिशा में तैयार और प्रेरित कर रहा है तो ये प्रेम भी है, ज़िम्मेदारी भी है, दोनों एक ही बात हैं। देखिए, दो तरह के प्रेम होते हैं — एक तो प्रेम उसकी तरफ़, जिसको परम-प्रेम कहते हैं, 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' और दूसरे हमारे प्रेम के ताने-बाने होते हैं ज़मीन पर, पृथ्वी पर, पार्थिव-प्रेम। और पार्थिव-प्रेम में इंसान का इंसान से, इंसान का ज़मीन से, इंसान का जानवरों से, नदियों से इन सब से नाता होता है, इसको बोलते हैं — 'इश्क़-ए-मज़ाज़ी'। वहाँ जाते हैं अपनी मुक्ति के लिए, वहाँ जहाँ वो प्रेम है, वहाँ उससे क्या नाता होता है? तेरे पास आ रहे हैं क्योंकि तेरे पास आकर ही आज़ादी मिलेगी। और ज़मीन पर दूसरों के प्रति प्रेम का क्या अर्थ होता है? जब आप कहते हैं कि, "मैं इस इंसान से प्यार करता हूँ", तो उसका वास्तविक अर्थ क्या होता है? कि मैं दूसरे को वो देना चाहता हूँ जो मैं वहाँ जाकर पाना चाहता हूँ।
माँ को बच्चे से प्रेम है वो प्रेम सच्चा-शुद्ध तभी हो सकता है जब माँ बच्चे को उसकी (परमात्मा की) संगत देना चाहे। 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' का मतलब हुआ — मैं सीधे उसके प्रेम में पड़ गया। 'इश्क़-ए-मज़ाज़ी' का मतलब हुआ — मैं दूसरे के लिए वो माध्यम बन गया जो दूसरे को उस तक ले जाएगा, ऊपर तक। समझ रहे हो बात को?

