

बहुत सारा मेडिटेशन वगैरह वही है जो आपको झटका नहीं खाने देगा। ज़िन्दगी बर्बाद चल रही है, सबकुछ आपका ग़लत है, लेकिन सुधरने की कोई ज़रूरत नहीं। आधे-एक घण्टे बैठ करके गाइडेड मेडिटेशन कर लो, वहाँ तुमको गुरुजी कान में बता देंगे कि तुम एक सरोवर के किनारे बैठे हो,…

ये मेडिटेशन चीज़ क्या है? मैं बताता हूँ यह चीज़ क्या है, यह फ़र्ज़ी चीज़ है, यह फ़रेब है, यह आत्म-प्रवंचना है, ख़ुद को धोखा है। यह जीवन के आमूलचूल बदलाव का तरीका नहीं है, यह कुछ समय का आध्यात्मिक मनोरंजन है। यह आपको आपकी गंदी दिनचर्या के तनाव से…

सिकंदर दुनिया में सिर्फ़ एक ही है असली; कौन? जो घड़ी को हरा दे। वरना बहुत बड़े-बड़े बादशाह हो गए, सब से जीत लेते हैं, किससे हार जाते हैं? घड़ी से; घड़ी से जीत कर दिखाओ तो बात है! समझ में आ रही बात?
वो टिक-टिक लगातार याद रहे। कलाई…

एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः। सर्वात्मा सर्वरूपश्चसर्वातीतोऽहमव्ययः।।
इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीरों से भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
~ अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४०)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता है कि उलझन आती है तो हम उसे ऑब्ज़र्व (ध्यान से देखना) करते हैं, उसपर सोचते हैं कि क्या उसका सल्यूशन (समाधान) हो सकता है। उस समय लगता है हाँ समझ गया मैं प्रॉब्लम क्या है। उस समय के लिए लगता है समझ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुप-चाप…

प्रश्नकर्ता: ध्यान केंद्रित करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
आचार्य: ध्यान केंद्रित कैसे करें। अभी सुन रहे थे तुम?
प्र: जी सर।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पहले मैं ध्यान करता था, लेकिन जब से नाईट शिफ्ट (रात की पाली) लगी है, समय नहीं मिल पाता। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा कैसा ध्यान था कि ध्यान के बावजूद तुम नाईट शिफ्ट में फँस गए बेटा? ये कौन सा ध्यान था जिसने तुम्हें इतना भी…

प्रश्नकर्ता: एक सवाल था। बेवकूफ़ी वाला है।
आचार्य प्रशांत: बड़ा वाला सवाल है! गम्भीरता देख रहे हो? पहले ही बता देंगे कि बेवकूफ़ी वाला सवाल है।
प्र: आचार्य जी, मैंने किताबें कुछ ज़्यादा पढ़ी नहीं हैं। कहीं से कुछ मिल जाता है तो, कभी कुछ चीजें ध्यान करते हुए अपने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। ओशो ने हमें ध्यान की विधियाँ दी, आप वो भी छीन रहे हैं। अब हम क्या करें?
आचार्य: नहीं, मैं छीन नहीं रहा विधियाँ। मैं कह रहा हूँ कि विधियों को विधियों जितनी ही महत्ता दो, बस। विधि द्वार है। द्वार को द्वार जितनी ही अहमियत…

प्रश्नकर्ता: क्या बीस मिनट का ध्यान करना सही है?
आचार्य प्रशांत: खेल की तरह करो, तो कुछ भी गलत नहीं है। हाँ, तुम ये सोचोगे कि किसी विधि का पालन करके तुम्हें सत्य मिल जाएगा, तो ये बात बेवकूफी की है। सही-गलत नहीं है; बेवकूफी है।
प्र: कैसी विधि से

प्रश्नकर्ता: जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत: इसका जो शास्त्रीय तरीक़ा है बताने का, शुरुआत वहाँ से करेंगे। दस तो मानी गई हैं इंद्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। और उसके अलावा होता है अन्तःकरण। अन्तःकरण क्या? अन्तःकरण चतुष्टय, जिसमें चार आते हैं। कौन…

निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥

प्रश्नकर्ता: जब ध्यान राम के पास नहीं होता, तो उस समय नहीं पता चलता, बाद में होश आता है। कैसे हर पल पता रहे कि ध्यान कहाँ है?
आचार्य प्रशांत: एक छोटी सी कहानी सुनाऊँगा, अच्छा प्रश्न है। मैं कॉलेज में था तो ऐसा बहुत होता था कि जो लोग…

वो चार अलग-अलग महासागरों और आठ अलग-अलग समुद्रों में तैर चुकी हैं।
स्वर्गीय माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी जी ने उन्हें वाटर एडवेंचर के लिए तेनज़िंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवार्ड से सम्मानित किया है।
वो अंटार्कटिक जल में खुली तैराकी में रिकॉर्ड स्थापित करने वाली पहली एशियाई महिला और

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ओशो कहते हैं, "धर्म का सार है- राम खुमारी।" 'राम खुमारी' क्या है? कृपया प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: तुम जिसे आमतौर पर होश कहते हो, जब समझ उठती है तो ये होश डगमगाने लगता है। ये झूठा होश है। कुछ वैसा-सा ही मज़ा आने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह जो 'मैं' (अहम्) है, जो शरीर की समाप्ति के साथ ही ख़त्म हो जाता है, वह असल में है क्या?
आचार्य प्रशांत: वो एक वृत्ति है। वो एक भटकी हुई वृत्ति है जिसका अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वो चिपकना भर जानता है। वो इससे …

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान और योग से मिलने वाले सुखद अनुभवों से मुक्त कैसे हों?
आचार्य प्रशांत: मुक्त क्या होना है! अपने आप को याद दिलाना है कि – जब उसकी छाया ऐसी है, तो वो कैसा होगा।
बड़ी गर्मी पड़ रही हो। तपती गर्मी, लू, जेठ माह की। मान

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि ‘ध्यान’ की कौन-सी विधियाँ हैं जो सीखी जा सकती हैं? ऐसी कौन-सी पद्धति अपना सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: अभी ये पद्धति है कि – सुनो।
पद्धतियाँ हज़ारों हैं, लाखों हैं। जो तुम्हारी अवस्था है, उसके हिसाब से पद्धति है। और ध्यान की तुम्हारे

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि आप कहते हैं कि ‘ध्यान’ ही प्रथम है, और हम अपना जीवन निरंतर ‘ध्यान’ में ही व्यतीत करें। बहुत कोशिश करते हैं पर ऐसा निरंतर हो नहीं पाता है। अगर इस मार्ग की ओर बढ़ने की चाह है, और ठीक से हो नहीं पा रहा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ओशो को पढ़ते हुए उनकी एक विधि का पता चला- विटनेसिंग (साक्षित्व)। लेकिन साक्षित्व की प्रक्रिया, करते-करते विचार बन जाते हैं। आरम्भ में लगता है कि साक्षित्व हो रहा है, लेकिन अंत में वो विचार बन जाता है।
इसमें थोड़ा दिशा-निर्देश करने की कृपा करें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र कहते हैं कि ध्यान की विधियाँ बंधन हैं। मेरी जिज्ञासा यह है कि इतनी सारी ध्यान की विधियाँ क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत:
विधियाँ उनके लिए हैं, जिन्हें सत्य को तो पाना है, और अपनी ज़िद को भी बचाना है। ख़ुदा को भी पाना है, और अपनी

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम । ध्यान करने बैठते हैं, तो मन भटकने क्यों लग जाता है? क्या किया जाए कि ध्यान बना रहे?
आचार्य प्रशांत: उन विषयों में चले जाईए, और देखिए कि उनमें ऐसा क्या ख़ास है कि आप आकर्षित हो जाते हैं।

प्रश्न: हमें कभी लगता है कि हम सही हैं, और हम वही चीज़ कर रहे हैं, पर हमें उस रास्ते पर लोगों के इतने कटाक्ष मिलते हैं कि हम उस रास्ते पर चल ही नहीं पाते।
आचार्य प्रशांत जी: डर लगा रहता है?

प्रश्न: दुःख को ध्यानपूर्वक देखने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत जी:
दुःख का असर तुम पर होता है, लेकिन तुम्हारा एक कोना ऐसा है, जहाँ दुःख नहीं पहुँच सकता। उस कोने को याद रखो बस। कुछ भी तुम्हारे साथ ऐसा कभी-भी नहीं होता है, जो तुम्हारे मन को पूरी

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी यह जो वक्तव्य आता है कि सब स्वचलित है, स्वघटित है मन को देने के लिए, अब जिसने यह समझ लिया कि न समाधि पाने की चीज़ है न विक्षेप पाने की चीज़ है, तो अब विचार तो आने बंद हो नहीं जाएँगे, लोग भी बाते करेंगे, वहाँ…

प्रश्नकर्ता: यह सब कुछ जो बताया जा रहा है, जो चल रहा है, चाहे ध्यान की विधियाँ, चाहे कुछ भी, जितना भी हमने अब तक करा। उसकी अनुभूति हमें कैसे हो? यह क्यों कराया जा रहा है। कौन सी स्थिति, हमें बताई जा रही है; हमें पहुँचाया कहाँ जा रहा…

प्रश्नकर्ता: यह सारे शास्त्रीय प्रश्नों के बारे में जानना ज़रूरी है क्या? और अगर ज़रूरी है, तो जानना मुश्क़िल है क्या?
आचार्य प्रशांत: कोई कठिन मॉडल (नमूना) नहीं है। उनमें ऐसी कोई जटिलता नहीं है कि तुम्हारे पल्ले ना पड़े। ज़िन्दगी को जितना समझते जाओगे न, ये सारी बातें, कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, असहज संतुलन और सहज संतुलन में क्या भेद है?
आचार्य प्रशांत:
सहज संतुलन होता है कि जहाँ पर तुम्हें असहज किया गया तो तुम पुनः सहज हो जाओगे।

ऊँ एक ऐसी ध्वनि है, जो शुरू तो शरीर के कंपन से होती है, लेकिन बोलते – बोलते ही विलीन हो जाती है। हम कहते है ना, ऊँ……म।तो म, रहते – रहते – रहते – रहते क्रमशः शून्य में विलुप्त हो जाता है। तो, ऊँ एक प्रकार की जीवन पध्दति…

प्रश्न: आचार्य जी, कल भजन गा रहे थे, “अमृत फल लिये हाथ, रुचै नहीं रार को।” भजन तो स्पष्ट है पूरा। रार जिसको समझाया है वो रार वो है जो दो को बताती है अलग-अलग। और अभी जो हम बात कर रहे हैं वो एक तरीके की तुलना कर…

आचार्य प्रशांत: पतंजलि कहते हैं, “वृत्तियों से मुक्ति के लिए अभ्यास और वैराग्य।” अभ्यास और वैराग्य – समझेंगे दोनों को।
दोनों युक्तियाँ हैं। पहले तो ये जाने दोनों विधियाँ हैं, दोनों ही मन के तल पर विधियाँ हैं – अभ्यास और वैराग्य। पर दोनों में थोड़ा अन्तर है। क्या…

आचार्य प्रशांत: जैसे-जैसे कुछ भी समझ में आता है, शुरुआत कहीं से भी करो, जैसे-जैसे कुछ भी समझ आएगा उस क्षेत्र के जो हिस्से हैं वो मिटते जाएँगे और एक एकीकृत करने वाली कोम्मुनालिटी सामने आती जाएगी, ये तो है ही है।
इतने सारे धूप के यहाँ छोटे-छोटे टुकड़े पड़े…

मुरली बाज उठी अणघातां । सुन के भुल्ल गईआं सभ बातां ।
लग्ग गए अनहद बान न्यारे, झूठी दुनियां कूड़ पसारे, साईं मुक्ख वेखन वणजारे, मैनूं भुल्ल गईआं सभ बातां ।
हुन मैं चैंचल मिरग फहाइआ, ओसे मैनूं बन्न्ह बहाइआ, सिरफ दुगाना इश्क पढ़ाइआ, रह गईआं त्रै चार कातां ।…

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढ़तां|
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विष्यलालसः||
~अष्टावक्र गीता (अध्याय-18, श्लोक-76)

वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।
“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार।…

प्रश्न: आत्मज्ञान कैसे हो?
वक्ता: स्पष्ट सी बात है कि जिसे जानना है, उसके करीब आना होगा। जिसे जानना है, उससे दूरी बना कर के तो कुछ जाना नहीं जा सकता। आत्मज्ञान में जिस आत्म की बात हो रही है, वो तो अहंकार ही है क्योंकि ज्ञान उसी का हो…

प्रश्नकर्ता (प्र): ध्यान का आखिरी बिंदु क्या है और ध्यान की अवस्थाएँ क्या-क्या हैं?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): ध्यान का आखिरी बिंदु, चरम बिंदु होता है मौन। और वही ध्यान का प्रथम बिंदु भी है। मौन की जगह जब मन होता है, तब मन मौन की ओर भागता है। मन का…

सुणिए हाथ होवै असगाहु
जपुजी (नितनेम)
वक्ता:जो हासिल किया नहीं जा सकता, जो बात दुष्प्राप्य है, वो भी सुनने से हाथ आ जाता है। जो तुम्हें अन्यथा कतई न मिलता, वो सुनने से मिल जाता है। क्या आशय है?

अष्टावक्र गीता – १९ अध्याय, श्लोक ५
क्व स्वप्न: क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणम तथा ।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ।।

प्रश्नकर्ता: ध्यान क्या है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान अपने आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, वो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार ही हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई करने की बात नहीं है। ध्यान को ऐसा ही समझ लो कि बेहोशी में ना…

प्रश्न: मैं ये जानना चाह रहा था की जैसे “ओम्” जो है और जैसे आपने बताया की ‛मौन में विलुप्ती’ तो “ओम्” में तो एक साउंड(ध्वनि) है। तो ओम् ही साइलेंस(मौन) है। या साइलेंस(मौन) में ओम् है?
वक्ता: उदाहरण है। कुछ और नहीं है। उदाहरण…

वक्ता: अर्थ माने जानते हैं क्या होता है? अर्थ माने ये होता है कि ये जो है, उसको मैं किसी और रूप में सामने रख रहा हूँ। इसलिए जिसको आपने अर्थ दे दिए, उसको आप कभी समझ नहीं पाएंगे। मन कहेगा, ‘’मैं जान सकता हूँ मात्र तब, जब अर्थ भरूं।…

आचार्य प्रशांत: जब बोला जाता है ‘साक्षी’, ‘बोध’, ‘चैतन्य’, तो ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा जगा हुआ इंसान होगा, और यहाँ हम कह रहें हैं कि ना, जो ‘साक्षी’ है, जो ‘बुद्ध’ है, जो ‘चैतन्य’ है, वो तो पूरा ही धुत है। छवि बनी हुई है कि वो गंभीर…

All I am seeing, when I see
All I am is hearing, when I hear
All I am is sentience, when I feel

प्रश्न: करीब का क्या अर्थ है? वाक् में आपके साथ, केबिन में आपके साथ या जो आप हैं उसे समझना? मैं चाहता हूँ मेरा संबंध आपसे प्रेम का बने, प्रभावित करने का नहीं।
वक्ता: करीब आना क्या है? वो तो जो करीब हैं वही बता सकते हैं। और अगर बता…

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभाव: स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक ४)

सोना सज्जन साधु जन, टूट जुड़े सौ बार।
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार।।
~ संत कबीर ~

नाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक २७)
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) शंकराचार्य के श्लोक को उद्धृत किया है, “आत्मा स्थूल…
प्र: जी।
आचार्य: ध्यान से? क्या उसके लिए कोई विधि लगाई ध्यान केंद्रित करने के लिए?
प्र: नहीं, यहाँ पर तो नहीं लगाई…
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…
प्रश्नकर्ता: अट्ठारह!…
दर्शाऊँ, कैसे होता है?
ये पेन है अभी…
वक्ता: “मूर्ख उस आत्मा को सुन…
श्रोता1: सुनने से कुछ मिलेगा की जगह इसको ऐसे…
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए क्या स्वप्न है, और क्या सुषुप्ति तथा क्या जागरण है और क्या तुरीय अवस्था है अथवा क्या भय ही है?…
वक्ता: ये ‘मैं हूँ’ ही इटेलिक्स में क्यों है?
श्रोता १: निरंतरता।
वक्ता: क्या निरंतरता? निरंतरता का मतलब समय…
अर्थ: “भाव और अभाव के माध्य स्वभाव का कभी नाश नहीं होता”
आचार्य प्रशांत: जिस सवाल का अष्टावक्र यहाँ पर जवाब दे रहें हैं, वो सवाल है कि, “क्या ‘है’?”। किसको कहा जाता है कि ‘है’?…
(जो धीर पुरुष अनेक विचारों से थककर अपने स्वरूप में विश्राम पा चुका है,
वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता ही है)
आचार्य प्रशांत: पहली…