प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार ऐसा होता है कि उलझन आती है तो हम उसे ऑब्ज़र्व (ध्यान से देखना) करते हैं, उसपर सोचते हैं कि क्या उसका सल्यूशन (समाधान) हो सकता है। उस समय लगता है हाँ समझ गया मैं प्रॉब्लम क्या है। उस समय के लिए लगता है समझ गया हूँ, फिर कई बार वही प्रॉब्लम आता है और हम फिर फँस जाते हैं। या तो प्रॉब्लम को हमने समझा ही नहीं था। या तो समझने का तरीका ही गलत था। टेम्पररी सल्यूशन (अस्थाई समाधान) मिल जाता है पर फिर प्रॉब्लम आती है तो फिर फँस जाते हैं।
आचार्य प्रशांत: ये जो छत है आश्रम की, जब बारिश होती है तो इसपर कहीं-कहीं पर पानी जमता है। उस पानी के कारण सीलन आ जाती है। जब जम ही जाता है पानी तो एक तरीका तो ये होता है कि जहाँ-जहाँ जमा है वहाँ से पानी को निकाल दो। निकाल दिया जाता है, भली बात। दो दिन बाद फिर बारिश होती है और...
प्र: फिर पानी।
आचार्य: फिर निकाल दो। जितनी बार बारिश होगी उतनी बार जमेगा। समस्या ढाँचागत है, स्ट्रक्चरल है, और तुम उसका तात्कालिक इलाज करना चाहते हो। सस्ता इलाज, वो होगा नहीं।
तुम सोचते हो, "अभी किसी तरीके से, कुछ युक्ति करके, जुगाड़ करके, निपट लूँ।" तुम ये नहीं समझ पा रहे हो कि तुम्हारे साथ जो भी समस्या आ रही है, वो इसलिए आ रही है क्योंकि तुम, तुम हो। जब तक तुम वो रोटी खा रहे हो जो तुम खाते हो, जब तक तुम वो कपड़ा पहन रहे हो जो तुम पहनते हो, जब तक तुम वो संगीत सुन रहे हो जो तुम सुनते हो, जब तक तुम उस हवा में साँस ले रहे हो जिस हवा में तुम हो, जब तक तुम वही दीवारें और वही चेहरे देख रहे हो जो तुम दिन रात देखते हो, जब तक तुम वही दिनचर्या पकड़े हुए हो जो तुमने पकड़ी है। तब तक ज़ाहिर सी बात है कि तुम्हें समस्याएँ भी वही मिलेंगी जो रोज़ मिलती हैं।



