प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि ‘ध्यान’ की कौन-सी विधियाँ हैं जो सीखी जा सकती हैं? ऐसी कौन-सी पद्धति अपना सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: अभी ये पद्धति है कि – सुनो।
पद्धतियाँ हज़ारों हैं, लाखों हैं। जो तुम्हारी अवस्था है, उसके हिसाब से पद्धति है। और ध्यान की तुम्हारे लिए उचित पद्धति क्या है, ये तुम्हें ‘ध्यान’ ही बता सकता है। या तो तुम्हारा ध्यान, या किसी और का ध्यान।
मैं चाहता हूँ कि ध्यान तुम्हारा ऐसा रहे, कि जब वो टूटने लगे, तो तुम्हें पद्धति बता दे बचने की। ऑटो-रिपेयर (स्व-चालित सुधार) की उसमें सुविधा रहे। जैसे शरीर में होती है न, कि शरीर में चोट लगती है तो शरीर ख़ुद ही उसे ठीक कर लेता है।
तो ध्यान में भी ऐसी जीवंतता रहे, कि ध्यान टूटा नहीं और ध्यान ख़ुद ही उपाय बता दे कि अब इसको ठीक कैसे करना है।
जीवन में प्रतिपल बदलते माहौल हैं। हर माहौल के लिए कोई तुम्हें विधि नहीं दे गया। जिन्होंने बड़ी करुणा के साथ तुम्हें विधियाँ दी भी हैं, वो बेचारे सौ, सवा-सौ, चार-सौ, पाँच-सौ पर जाकर अटक गए। इससे ज़्यादा कौन अब बताएगा। लेकिन जीवन में स्थितियाँ कितनी हैं, सौ, चार-सौ, या करोड़ों?
तो तुम्हें ध्यान की करोड़ों विधियाँ चाहिए। और ये बात तुम्हें किताब में नहीं मिलेगी। इसके लिए तो तुम्हें स्वयं ही सजग रहना पड़ेगा, कि इस माहौल में ध्यान का क्या अर्थ है।



